द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही के बाद जब यूरोप करीब 4 करोड़ मौतों, उजड़े शहरों और चरमराती अर्थव्यवस्था के मलबे पर खड़ा था, तब एक सवाल सबसे बड़ा था—अब सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? इसी भय, अविश्वास और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) का जन्म हुआ। इसका घोषित उद्देश्य था सामूहिक सुरक्षा, लेकिन असली वजह थी सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकना।
द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद दुनिया दो ध्रुवों में बंट चुकी थी—एक ओर अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी खेमे, दूसरी ओर सोवियत संघ। यूरोप के कई देश युद्ध से इतने कमजोर हो चुके थे कि वे अकेले किसी नए खतरे का सामना नहीं कर सकते थे। ऐसे में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस समेत 12 देशों ने मिलकर NATO की नींव रखी। इसका मूल सिद्धांत था—एक पर हमला, सभी पर हमला।
शीत युद्ध के दौर में NATO पश्चिमी सैन्य शक्ति का प्रतीक बन गया। यूरोप में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ी, परमाणु संतुलन कायम हुआ और सोवियत विस्तार को रोका गया। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद NATO के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे। कई विश्लेषकों का मानना था कि अब इसका उद्देश्य समाप्त हो चुका है।
इसके बावजूद NATO न केवल बचा रहा, बल्कि उसने पूर्वी यूरोप तक विस्तार किया। पोलैंड, हंगरी, बाल्टिक देश जैसे कई राष्ट्र इसमें शामिल हुए, जिसे रूस ने अपने लिए सीधा खतरा माना। यहीं से NATO और रूस के बीच तनाव की नई कहानी शुरू हुई, जो यूक्रेन युद्ध के साथ चरम पर पहुंच गई।
हाल के वर्षों में NATO के भीतर भी मतभेद गहराते नजर आए हैं। अमेरिका और यूरोप के बीच रक्षा खर्च, रणनीति और नेतृत्व को लेकर असहमति बढ़ी है। इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रम्प का नाम बार-बार सामने आता है। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ट्रम्प ने NATO को “पुराना संगठन” कहा और यूरोपीय देशों पर आरोप लगाया कि वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं, लेकिन खर्च नहीं करते।
ट्रम्प की “America First” नीति ने NATO की एकजुटता पर गहरा असर डाला। अब जब वे दोबारा सत्ता में लौट चुके हैं, तो यह आशंका फिर मजबूत हो गई है कि अमेरिका NATO से दूरी बना सकता है या उसकी भूमिका सीमित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह NATO के ताबूत में “आखिरी कील” साबित हो सकती है, खासकर तब जब यूरोप अभी भी अपनी सामूहिक सैन्य क्षमता को लेकर पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है।
हालांकि समर्थकों का कहना है कि रूस, चीन और वैश्विक अस्थिरता के दौर में NATO पहले से ज्यादा प्रासंगिक है। लेकिन आलोचक सवाल उठा रहे हैं—क्या 76 साल पुराना सैन्य गठबंधन आज की बदलती दुनिया के साथ खुद को ढाल पाएगा?
कुल मिलाकर, NATO का भविष्य अब सिर्फ बाहरी खतरों पर नहीं, बल्कि अमेरिका की राजनीतिक इच्छाशक्ति, यूरोप की एकजुटता और आंतरिक विश्वास पर निर्भर करता है। यह तय आने वाले साल करेंगे कि NATO इतिहास की किताबों में दर्ज एक गठबंधन बनकर रह जाएगा या फिर नए रूप में खुद को जीवित रख पाएगा।