उ0प्र0 के मुख्यमंत्री हरिद्वार, उत्तराखण्ड में स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज के समाधि मंदिर के लोकार्पण तथा श्री विग्रह मूर्ति के स्थापना समारोह में सम्मिलित हुए
पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज भारत की सनातन परम्परा के ध्वजवाहक थे : मुख्यमंत्री
पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज ने भारत माता के भव्य मन्दिर का निर्माण कराकर चिरस्थायी स्मारक के रूप में देशवासियों को समर्पित किया
प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन तथा उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड में विकास व विरासत की यात्रा तीव्र गति से आगे बढ़ रही
मुख्यमंत्री ने स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज की स्मृतियों को नमन करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की
देवभूमि, उत्तराखण्ड के चार धाम भारत की आध्यात्मिक चेतना का आधार
अयोध्या, काशी, मथुरा, प्रयागराज, केदारपुरी, बद्रीनाथ धाम से हरिद्वार तक विरासत को संरक्षित करते हुए विकास की लम्बी गाथा आगे बढ़ रही
यह धाम मात्र आस्था के केन्द्र नहीं, बल्कि राष्ट्र चेतना के केन्द्र बिन्दु
उ0प्र0, देश की नम्बर 02 की अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी यात्रा को आगे बढ़ा रहा
उ0प्र0 बीमारू राज्य से उबरकर भारत की अर्थव्यवस्था का ब्रेक-थू्र स्टेट बनकर लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर
अब उ0प्र0 में अराजकता, दंगे-फसाद, गुण्डागर्दी नहीं, ‘न कर्फ्यू, न दंगा, यू0पी0 में है अब सब चंगा’
इतिहास साक्षी कि जो राष्ट्र अपनी सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा करता, वह कभी भी वर्तमान को सुदृढ़ तथा भविष्य को सुरक्षित नहीं कर पाता
स्वरोजगार भारत की मूल शक्ति, हमारे अन्नदाता किसान उत्पादक, कारीगर उद्यमी तथा व्यापारी राष्ट्र को जोड़ने वाले सेतु
माघ मेले में पौष पूर्णिमा से लेकर अब तक लगभग 21 करोड़ श्रद्धालु त्रिवेणी में आस्था की पवित्र डुबकी लगा चुके
लखनऊ : 06 फरवरी, 2026 :ः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज भारत की सनातन परम्परा के ध्वजवाहक थे। उन्होंने करुणा और मैत्री का संदेश जन-जन तक पहुँचाया था। उनके जीवन का मूल मंत्र समन्वय था। उन्होंने राष्ट्र भक्ति के मूल्यों के साथ किसी भी सम-विषम परिस्थिति में समर्पण नहीं किया। उन्होंने जीवनपर्यन्त नाम के अनुरूप कार्य करके दिखाया।
मुख्यमंत्री जी आज हरिद्वार, उत्तराखण्ड में पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज के समाधि मन्दिर के लोकार्पण एवं श्री विग्रह मूर्ति स्थापना के अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज की स्मृतियों को नमन करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर ‘अनिर्वचनीय’ तथा ‘अमृत निधि’ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। उन्होंने कहा कि पूज्य स्वामी जी महाराज की स्मृतियाँ हम सभी के समक्ष हैं। भारत के सनातन धर्म की संन्यास परम्परा के अद्वितीय व्यक्तित्व, निवृत्त शंकराचार्य, जूना अखाड़ा के आचार्य महामण्डलेश्वर के रूप में स्वामी जी का सान्निध्य सम्पूर्ण सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त हुआ। वह भारत माता मन्दिर के संस्थापक थे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 1982 में भारत माता मन्दिर का लोकार्पण कार्यक्रम बहुत भव्य एवं अद्भुत था। भारत माता मन्दिर का लोकार्पण उस समय हुआ, जब देश विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहा था। उस समय देश को किस प्रकार का आध्यात्मिक नेतृत्व चाहिए, इसके लिए पूज्य स्वामी जी महाराज ने भारत माता के भव्य मन्दिर का निर्माण कराकर चिरस्थायी स्मारक के रूप में देशवासियों को समर्पित किया था। यह प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक पूज्य बाला साहब देवरस जी की कार्यक्रम में एक साथ उपस्थिति यह तय करती थी, कि हमारा राष्ट्राध्यक्ष के प्रति सम्मान का भाव होगा, लेकिन मूल्यों एवं आदर्शां के प्रति किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं होगा। भारत माता मन्दिर हमें नई प्रेरणा प्रदान कर रहा है। यह अनन्तकाल तक नई प्रेरणा का आधार बना रहेगा।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तराखण्ड देवभूमि है। यहाँ के चार धाम भारत की आध्यात्मिक चेतना का आधार हैं। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं के मन में सदैव यह भाव आता है कि हर की पैड़ी में स्नान करने के साथ-साथ भारत माता मन्दिर का दर्शन करना है। भारत माता मन्दिर का निर्माण वर्ष 1982 में भारत को उत्तर से दक्षिण तथा पूरब से पश्चिम तक जोड़ते हुए सभी लोगों के समन्वय के आधार पर हुआ था। यह मन्दिर हरिद्वार, उत्तराखण्ड की सबसे ऊँची इमारतों में से एक है। भारत माता मन्दिर में लोग जाति, क्षेत्र, मत-मजहब तथा भेदभाव से मुक्त होकर एक छत्र के नीचे समाहित होते हैं। यह कार्य विगत 44 वर्ष पूर्व से हम सभी को देखने को मिला।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तराखण्ड में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्शन तथा मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में विकास व विरासत की यात्रा तीव्र गति से आगे बढ़ रही है। यह अद्भुत एवं अभिनन्दनीय है। विगत 11 वर्षों में देश में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। विरासत और विकास साथ-साथ चल रहे हैं। सामूहिक सहयोग व प्रयास से ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का निर्माण किया जा रहा है। अयोध्या, काशी, मथुरा, प्रयागराज, केदारपुरी, बद्रीनाथ धाम से हरिद्वार तक विरासत को संरक्षित करते हुए विकास की लम्बी गाथा आगे बढ़ रही है। यह नये भारत के निर्माण की वह गाथा है, जिसका इन्तजार सैकड़ों वर्षां से था।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत भौगोलिक दृष्टि से एक टुकड़ा मात्र तथा किसी सत्ता की उपज नहीं है, बल्कि भारत यहाँ की ऋषि परम्परा की तपस्या की शाश्वत चेतना का केन्द्र बिन्दु है, जिसने जीवन का दर्शन दिया है। यहाँ पर संस्कृति केवल आस्था नहीं, बल्कि समग्र जीवन दर्शन है। यह किसी एक तिथि में नहीं बना है और न ही किसी सत्ता की देन है। सनातन चेतना इसके स्वाभाविक प्रवाह की वह धारा है, जिसने भारत के सर्वाच्च न्यायालय पर लिखने के लिए ‘यतो धर्मः ततो जयः’ का बोध वाक्य दिया। भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी इस मंत्र को अंगीकार करता है कि जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। हमें धर्म और विजय का यह शाश्वत स्वरूप हमेशा आभास कराता है कि धर्म कभी कमजोर नहीं होता, बल्कि उसे जानबूझ कर कमजोर किया जाता है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि जो राष्ट्र अपनी सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा करता है, वह कभी भी वर्तमान को सुदृढ़ तथा भविष्य को सुरक्षित नहीं कर पाता। वैदिक भारत आत्मनिर्भर भारत की सभ्यता का प्रतीक है। आक्रान्ताओं के आने के पूर्व भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि पूर्ण विकसित सभ्यता एवं संस्कृति थी। यह राष्ट्र हमारे ऋषियों की तपस्या, किसानों के श्रम तथा कारीगरों की सृजनशीलता के परिणामस्वरूप बना था। 02 हजार वर्ष पूर्व भारत के स्वर्णयुग के समय दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत थी। 400 वर्ष पूर्व विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत थी। यह हिस्सेदारी ऋषि-मुनियों की तपस्या, अन्नदाता किसानों की सृजनशीलता तथा कारीगरों के परिश्रम के बल पर थी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ग्राम स्वराज की बात कहते थे, उस समय यह गांव एक आत्मनिर्भर इकाई थे। भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, वस्त्र एवं धातुकर्म आदि उद्योगों द्वारा संचालित होती थी। सारे कार्य गाँव के अन्दर ही संचालित होते थे। किसी बाहरी सत्ता का हस्तक्षेप नहीं था तथा गाँव किसी अनुदान पर भी निर्भर नहीं था। स्वरोजगार भारत की मूल शक्ति थी। हमारे अन्नदाता किसान उत्पादक, कारीगर उद्यमी तथा व्यापारी ‘राष्ट्र को जोड़ने वाले सेतु’ होते थे। व्यापारी पूरब से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक दुनिया के अन्य देशों में भारत के उत्पाद को पहुँचाने का माध्यम बनते थे। ग्राम स्वराज शासन का मॉडल था। निर्णय गाँव में होते थे, संसाधन गाँव में निहित थे और उत्तरदायित्व भी गाँव का ही होता था।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि गुरुकुल ऋषि आश्रमों में संचालित होते थे। गुरुकुल की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी। गुरुकुल में कृषि, खगोल, आयुर्वेद, शिल्प और प्रशासन आदि व्यावहारिक ज्ञान सिखाए जाते थे। उन्होंने कहा कि वे स्वयं भी आश्रम व्यवस्था से जुडे़ हुए हैं। प्रशासनिक ज्ञान गुरुकुल शिक्षा का हिस्सा है। प्रशासन तथा प्रबन्धन का ज्ञान भारत का संन्यासी, आश्रम पद्धति से सीखता है। एम0बी0ए0 की डिग्री हमें उसी आश्रम में प्राप्त होती है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारतीय नारी सामाजिक अर्थव्यवस्था में बराबर की सहभागी थी। उसे कभी पराधीन नहीं बनाया गया था। समाज में नारी का सदैव अपना प्रभाव था। लेकिन आक्रान्ताओं के साथ-साथ लूट आधारित अर्थतंत्र ने स्थानीय उत्पादों को नष्ट किया। परिणामस्वरूप ग्राम स्वराज टूटा। ग्रामीण स्वरोजगार व्यवस्था का स्थान कर-आधारित व्यवस्था ने ले लिया। टैक्स दो और सरकार पर निर्भर रहो। आश्रम परम्परा से विमुख हुए कारीगर ‘गुलाम’ तथा किसान ‘करदाता’ बन गये। किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गया। जब गाँव टूटता है, तो राष्ट्र की नींव हिलती और टूटती है। यही हमारे साथ हुआ। भारत को उत्पादक से उपभोक्ता बनाने का कार्य औपनिवेशिक कालखण्ड में हुआ।
400 वर्ष पूर्व तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की अर्थव्यवस्था का योगदान 25 प्रतिशत था। 11 वर्ष पूर्व भारत दुनिया की 11वीं अर्थव्यवस्था बनकर रह गया था। वर्ष 1947 तक आते-आते वैश्विक अर्थव्यवस्था में देश की हिस्सेदारी मात्र 02 प्रतिशत रह गई थी। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में आज नया भारत दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, क्योंकि आज हमने अपनी विरासत को समझा और उस पर विश्वास कर उसकी परम्परा को आत्मसात किया है। परिणामस्वरूप आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भारत आगे बढ़ा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उत्तराखण्ड का निर्माण वर्ष 2000 में हुआ। केन्द्रीय रक्षा मंत्री जी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे। उत्तराखण्ड ने तब से विकास की लम्बी यात्रा तय की है। विकास की इस यात्रा में उत्तराखण्ड निरन्तर आगे बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में जब विरासत को सम्मान नहीं मिलता था, जब रामभक्तों पर गोलियाँ चलती थीं और रामभक्त अपमानित होता था, तो वह अपमान भारत की विरासत तथा आध्यात्मिक मूल्यों का होता था। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश अराजकता और लूट का अड्डा बन गया था। दंगों की आग में झुलसता था। गुण्डागर्दी चरम पर थी। बेटियाँ और व्यापारी असुरक्षित थे। जब विरासत का सम्मान हुआ, तब बेटी व व्यापारी भी सुरक्षित हो गए। उत्तर प्रदेश, देश की दूसरे नम्बर की अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी यात्रा को आगे बढ़ा रहा है। 500 वर्षों के बाद अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण हुआ है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मथुरा-वृन्दावन, प्रयागराज, अयोध्या, काशी, हरिद्वार, बद्रीनाथ धाम, केदारनाथ धाम मात्र आस्था के केन्द्र नहीं, बल्कि राष्ट्र चेतना के केन्द्र बिन्दु हैं। भारत राष्ट्र यहाँ से शक्ति प्राप्त करता है। डबल इंजन सरकार द्वारा आस्था के इन केन्द्रों को सम्मान के साथ आगे बढ़ाया गया और संरक्षित करने का कार्य किया गया। आज उत्तर प्रदेश बीमारू राज्य की श्रेणी से उबरकर भारत की अर्थव्यवस्था का ब्रेक-थू्र स्टेट बनकर लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर कार्य कर रहा है। अब उत्तर प्रदेश में अराजकता, दंगे-फसाद, गुण्डागर्दी नहीं है, अर्थात ‘न कर्फ्यू, न दंगा, यू0पी0 में है अब सब चंगा’। दंगा और दंगाई दोनों गायब हो गए हैं, उनमें कर्फ्यू लग गया है। स्पष्ट नीति और साफ नीयत के कारण उन पर कर्फ्यू लगाने में सफलता प्राप्त हुई है। उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का केन्द्र बिन्दु है। उस केन्द्र बिन्दु को जगाने का कार्य भारत की ऋषि एवं आध्यात्मिक परम्परा ने किया है। भारत के यशस्वी नेतृत्व व मार्गदर्शन में आज भारत निरन्तर आगे बढ़ रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने पूज्य अवधेशानन्द गिरि जी महाराज का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने माघ मेले के सफल आयोजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महाकुम्भ के अवसर पर उन्होंने एक अभिभावक के रूप में वहाँ खड़े रहकर सम्पूर्ण आयोजन को निर्विघ्न सम्पन्न कराया। एक समय माघ मेला केवल कल्पवासियों का मेला होता था, लेकिन इस मेले में पौष पूर्णिमा से लेकर अब तक लगभग 21 करोड़ श्रद्धालु माँ गंगा, माँ यमुना और अदृश्य माँ सरस्वती की त्रिवेणी में आस्था की पवित्र डुबकी लगा चुके हैं।
कार्यक्रम को केन्द्रीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री श्री मनोहर लाल, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सम्बोधित किया।
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