भारतीय वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रस्तावित 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद योजना देश की रक्षा नीति का अहम हिस्सा बनती जा रही है। रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) द्वारा इस मेगा खरीद को मंजूरी मिलने के बाद अब इसके तकनीकी और रणनीतिक पहलुओं पर चर्चा तेज हो गई है। यह सौदा करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का माना जा रहा है और इससे वायुसेना की परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रस्तावित बेड़े में लगभग 90 राफेल F-4 और 24 उन्नत F-5 संस्करण शामिल हो सकते हैं। F-5 को “सुपर-राफेल” के रूप में देखा जा रहा है, जो मौजूदा F-3R या F-4 की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रदर्शन क्षमता से लैस होगा।
वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास जो राफेल विमान हैं, वे F-3R मानक के हैं, जबकि भविष्य का F-5 वर्जन अधिक शक्तिशाली इंजन, बेहतर रेंज, बढ़े हुए पेलोड और उन्नत नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं से लैस हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें ड्रोन-सहयोग, हाइपरसोनिक हथियार समर्थन और लंबी अवधि तक संचालन योग्य प्लेटफॉर्म जैसी क्षमताएँ शामिल हो सकती हैं, जो इसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की श्रेणी में प्रतिस्पर्धी बनाती हैं।
डिलीवरी टाइमलाइन की बात करें तो शुरुआती विमानों के आने में लगभग साढ़े तीन साल लग सकते हैं, जबकि अत्याधुनिक F-5 संस्करण 2030 के आसपास या उसके बाद उपलब्ध होने की संभावना जताई जा रही है।
इस सौदे का एक अहम पहलू “मेक इन इंडिया” पहल भी है। योजना के तहत अधिकांश विमान भारत में ही निर्मित या असेंबल किए जाएंगे, जिससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय उद्योगों को तकनीकी हस्तांतरण का अवसर मिलेगा। अनुमान है कि कुल विमानों का बड़ा हिस्सा घरेलू निर्माण के जरिए तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि नए राफेल बेड़े से वायुसेना की घटती स्क्वाड्रन संख्या की समस्या को आंशिक राहत मिलेगी और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में रणनीतिक बढ़त हासिल हो सकती है।