दिल्ली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर वैश्विक चर्चा का सबसे बड़ा मंच बनने जा रहा है, क्योंकि भारत में कल से अंतरराष्ट्रीय एआई शिखर सम्मेलन का आगाज़ होगा। यह बहुचर्चित आयोजन 16 से 20 फरवरी तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें विश्व राजनीति, उद्योग और प्रौद्योगिकी जगत की प्रमुख हस्तियां हिस्सा लेंगी। इस समिट में सात राष्ट्रपति, दो उपराष्ट्रपति, नौ प्रधानमंत्री के साथ कई वैश्विक कंपनियों के शीर्ष अधिकारी शामिल होने वाले हैं, जिससे इसे इस वर्ष का एक अहम तकनीकी-कूटनीतिक कार्यक्रम माना जा रहा है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, यह सम्मेलन केवल औपचारिक बैठक नहीं बल्कि वैश्विक सहयोग और नीतिगत विमर्श का बड़ा मंच होगा। इसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आर्थिक प्रभाव, नियमन, सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक उपयोग जैसे विषयों पर चर्चा करेंगे। समिट में 20 देशों के शीर्ष नेता और लगभग 45 देशों के मंत्रीस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भाग लेंगे, जिससे इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व और बढ़ जाता है।
इस कार्यक्रम में राजनीतिक नेताओं के साथ-साथ टेक उद्योग के बड़े नाम भी शामिल होंगे। भारतीय उद्योग जगत के दिग्गजों और प्रमुख वैश्विक कंपनियों के अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय संवाद, सीईओ राउंडटेबल और विशेषज्ञ पैनल आयोजित किए जाएंगे। सम्मेलन में 700 से अधिक सत्र प्रस्तावित हैं, जिनमें एआई गवर्नेंस, डेटा सुरक्षा, नैतिकता और नवाचार पर गहन विमर्श होगा।
यह आयोजन भारत की डिजिटल कूटनीति और तकनीकी नेतृत्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। केंद्र सरकार के निमंत्रण पर आने वाले नेताओं में कई देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शामिल हैं, जो द्विपक्षीय बैठकों के साथ भविष्य की तकनीकी साझेदारी पर भी चर्चा करेंगे। सम्मेलन को वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूत करने वाले मंच के रूप में भी देखा जा रहा है, जहां विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीकी सहयोग की संभावनाएं तलाश की जाएंगी।
हालांकि, आयोजन से जुड़ी चर्चाओं के बीच कुछ बदलाव भी सामने आए हैं। उदाहरण के तौर पर, एक प्रमुख वैश्विक चिप कंपनी के सीईओ ने अप्रत्याशित कारणों से अपनी यात्रा रद्द कर दी है, लेकिन आयोजकों का कहना है कि समिट का एजेंडा और सहभागिता पहले की तरह व्यापक और प्रभावशाली रहेगी।
समग्र रूप से देखा जाए तो यह सम्मेलन भारत को वैश्विक एआई संवाद के केंद्र में स्थापित करने का अवसर है। राजनीतिक नेतृत्व, उद्योग जगत और विशेषज्ञों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास और नियमन में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है।