मध्य प्रदेश में गोवध पर सख्त कानूनी रोक और सरकार के दावों के बावजूद भोपाल से सामने आया मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है। राजधानी के एक बूचड़खाने में करीब 200 गायों के कथित रूप से कटे जाने की खबर ने प्रशासनिक व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर सीधा प्रहार किया है। यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब राज्य सरकार लगातार गोसंरक्षण को लेकर सख्ती के दावे करती रही है।
राज्य में गोवंश वध निषेध अधिनियम के तहत गाय के वध पर पूर्ण प्रतिबंध है और इसके उल्लंघन पर कड़ी सजा का प्रावधान भी मौजूद है। इसके बावजूद भोपाल जैसे संवेदनशील और प्रशासनिक रूप से अहम शहर में इतनी बड़ी संख्या में गायों का कत्ल होना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं सिस्टम ने आंखें मूंद रखी थीं। सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी गतिविधि बिना स्थानीय प्रशासन, नगर निगम और पशु चिकित्सा विभाग की जानकारी के कैसे चलती रही।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, जिस बूचड़खाने में यह घटना सामने आई, वहां नियमित निरीक्षण की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की थी। इसके बावजूद न तो समय पर जांच हुई और न ही किसी तरह की कार्रवाई। इससे यह संदेह और गहराता है कि या तो लापरवाही बरती गई या फिर मिलीभगत के चलते इस पूरे मामले को नजरअंदाज किया गया। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा है और इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताया है।
इस मामले ने गोसंरक्षण के नाम पर चल रही राजनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर गोवध पर सख्त कानून और दूसरी ओर राजधानी में खुलेआम उल्लंघन—यह विरोधाभास आम जनता के विश्वास को कमजोर करता है। सामाजिक संगठनों और गौ रक्षक समूहों ने घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
सरकार और प्रशासन की ओर से मामले की जांच के आदेश दिए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच से ही जिम्मेदारी तय होगी? जब तक लापरवाह अधिकारियों और जिम्मेदार संस्थाओं पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगना मुश्किल है।
भोपाल की यह घटना केवल एक शहर तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान है। गोसंरक्षण को लेकर बनाए गए कानूनों का वास्तविक पालन तभी संभव है, जब निगरानी तंत्र ईमानदारी से काम करे और किसी भी स्तर पर लापरवाही को बर्दाश्त न किया जाए। वरना कानून किताबों तक ही सीमित रह जाएंगे और जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग बनी रहेगी।