आगामी बजट 2026 से पहले मध्यम वर्ग और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच एक मांग तेजी से उभर रही है—लंबी अवधि की बचत (Long-Term Savings) को प्रोत्साहित करने के लिए आयकर छूट ढांचे को नए सिरे से मजबूत किया जाए। खास तौर पर इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80C के तहत मिलने वाली डिडक्शन लिमिट बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
वर्तमान में सेक्शन 80C के तहत पीपीएफ (PPF), ईपीएफ (EPF), जीवन बीमा प्रीमियम, ट्यूशन फीस, ईएलएसएस (ELSS) और होम लोन प्रिंसिपल जैसे निवेशों पर कुल मिलाकर 1.5 लाख रुपये तक की कर छूट मिलती है। लेकिन यह सीमा पिछले कई वर्षों से अपरिवर्तित है, जबकि महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च, तथा जीवन-यापन की लागत में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में करदाताओं का कहना है कि यह लिमिट आज की आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गई है।
वित्तीय योजनाकारों का मानना है कि अगर सरकार 80C डिडक्शन लिमिट को बढ़ाकर 2.5 से 3 लाख रुपये कर देती है, तो इससे न केवल घरेलू बचत दर में सुधार होगा बल्कि लोग लंबी अवधि के सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर भी अधिक आकर्षित होंगे। इससे पूंजी बाजार और सरकारी बचत योजनाओं दोनों को मजबूती मिल सकती है।
इसके अलावा, विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि 80C के तहत आने वाले निवेश साधनों की सूची की समीक्षा की जानी चाहिए। नई अर्थव्यवस्था के अनुरूप रिटायरमेंट प्लानिंग, हेल्थ सिक्योरिटी और बच्चों की उच्च शिक्षा से जुड़े दीर्घकालिक निवेशों को भी ज्यादा प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इससे कर नीति सिर्फ टैक्स बचत का माध्यम न रहकर सामाजिक सुरक्षा का उपकरण भी बन सकती है।
मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ कम करने के लिहाज से भी यह कदम अहम माना जा रहा है। नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) के आने के बाद कई लोग छूट वाली पुरानी व्यवस्था और बिना छूट वाली नई व्यवस्था के बीच उलझन में हैं। यदि 80C जैसी प्रमुख छूटों को और आकर्षक बनाया जाता है, तो करदाताओं को योजनाबद्ध बचत की दिशा में स्पष्ट संकेत मिलेगा।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, बढ़ी हुई टैक्स छूट से तत्काल राजस्व पर कुछ दबाव जरूर आ सकता है, लेकिन लंबी अवधि में इससे वित्तीय अनुशासन, निवेश संस्कृति और घरेलू पूंजी निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। ऐसे में बजट 2026 में सेक्शन 80C को फिर से प्रासंगिक और प्रभावी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की उम्मीद बढ़ गई है।