मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर बड़ा सैन्य हमला करने की धमकी और मध्य पूर्व में शक्तिशाली नौसेना बेड़े को तैनात करने के बीच, ईरान और कई इस्लामिक देशों ने ऐतिहासिक रूप से सशक्त विरोध दर्ज कराया है। संकट अब सिर्फ दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि पूरी विश्व राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा है कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं करेगा, तो अमेरिका भारी सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार है। इस दिशा में उन्होंने USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर और अन्य जंगी जहाजों को मध्य पूर्व की ओर भेजा है, जो स्पष्ट रूप से युद्ध की आशंका को और गहरा रहा है।
ट्रंप की इस धमकी के जवाब में ईरानी नेतृत्व ने न सिर्फ जवाबी बयान दिया है, बल्कि तेजी से प्रतिरोध और जवाब के लिये तैयार रहने का संकेत भी जारी किया है।
ईरानी राष्ट्रपति मासूद पेजेश्कियन ने टिप्पणी की है कि किसी भी शत्रुता पर ईरान की प्रतिक्रिया “कड़ी और पछताने वाली” होगी। उनका यह बयान ट्रंप से पहले हुए संवाद के बाद आया, जब ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान न्यूक्लियर मुद्दे पर समझौता नहीं करेगा, तो अमेरिका और उसके सहयोगी अब और भी सख्त कदम उठा सकते हैं।
ईरान के सेना प्रमुख और प्रतिनिधियों ने बार-बार कहा है कि वे किसी भी बाहरी धमकी को बर्दाश्त नहीं करेंगे और “गलती करने पर जवाब पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा।”
ईरान के अलावा कई इस्लामिक देशों और समूहों ने भी अमेरिका की धमकियों पर खुलकर प्रतिक्रिया दी है। ईरान भी स्पष्ट कर चुका है कि अगर हमला होता है, तो यह केवल एक द्विपक्षीय संघर्ष नहीं रहेगा बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक स्थिरता पर पड़ेगा।
कूटनीतिक मोर्चे पर सऊदी अरब, तुर्किये और यूएई जैसे देशों ने युद्ध की आशंका को रोकने के लिये अमेरिका पर कूटनीति बढ़ाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा है कि सैन्य कार्रवाई एक बड़ी गलती होगी, जो पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है।
इसी बीच यूरोपीय संघ (EU) ने ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को आतंकवादी संगठन के रूप में घोषित कर दिया है, जो अमेरिका के पहले से लिए गए एतराज का समर्थन करता है और ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव को बढ़ाता है।
ईरानी विदेश मंत्री ने इस कदम को “रणनीतिक रूप से बड़ी गलती” बताया है और चेतावनी दी है कि इससे क्षेत्रीय संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तनाव का केंद्र बिंदु ईरान का परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता, और मध्य पूर्व में संतुलन है। ट्रंप प्रशासन की धमकी का इरादा ईरान को परमाणु मुद्दों पर मजबूर वार्ता में लाना था, लेकिन इसने स्थानीय और वैश्विक प्रतिक्रियाओं को उकसा दिया है।
कूटनीतिक स्तर पर रूस जैसे देशों ने युद्ध की आशंका को एक त्रासदी बताया है और कहा है कि सैन्य कार्रवाई क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है, इसलिए बातचीत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष एक बड़े युद्ध में नहीं बदलना चाहिये, परन्तु ट्रंप की सैन्य चेतावनी और नौसैनिक तैनाती से तनाव में वृद्धि हो चुकी है। ईरान ने यह ज़ोर देकर कहा है कि वह अपने लोगों और क्षेत्र की रक्षा करेगा, और वह किसी भी हमले पर व्यापक प्रतिक्रिया देगा।
दूसरी ओर, कई इस्लामिक देश और वैश्विक शक्ति राष्ट्र युद्ध से बचने के लिये कूटनीति को प्राथमिकता देने का सुझाव दे रहे हैं, क्योंकि व्यापक संघर्ष पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित कर सकता है और तेल कीमतों, शरणार्थी संकट तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
ट्रंप की धमकियों के बीच दुनिया भर में डर की लकीर फैल रही है। मध्य पूर्व के राष्ट्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी तरह की सैन्य आग का इस्तेमाल नहीं चाहेंगे, और युद्ध एक बड़ी गलती साबित हो सकता है।
ईरान के जवाबी रुख ने यह संकेत दिया है कि मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष से बड़ी प्रतिक्रिया मिल सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक तंत्रों पर भी प्रभाव पड़ेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं है। ट्रंप की धमकियों और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन ने पूरा इस्लामिक वर्ल्ड और अंतरराष्ट्रीय समुदाय खड़ा कर दिया है — कुछ देश युद्ध के खतरे को कम करने के लिये बातचीत चाहते हैं, जबकि ईरान और उसके भागीदार हमले की स्थिति में कठोर जवाब देने के लिये तैयार हैं।
यह पूरी स्थिति एक बड़ी भू-राजनीतिक टकराव की आशंका को जन्म देती है, जिसका असर केवल मध्य पूर्व नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता, तेल बाजार, और सुरक्षा ढांचे पर भी पड़ेगा। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीति और बातचीत ही इस तनाव को हल करने की एकमात्र सार्थक राह है, क्योंकि सैन्य कार्रवाई एक बड़ी गलती साबित हो सकती है।