शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस बार के माघ मेले को बिना संगम स्नान किए भारी मन के साथ छोड़ दिया। आगामी माघ स्नान परंपरा में हिस्सा न ले पाने की निराशा और प्रशासन के साथ चल रहे विवाद के बीच उन्होंने बुधवार को विदा लेने का निर्णय लिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने लगभग 10 दिनों तक अपने शिविर के बाहर धरना दिया था, जो मौनी अमावस्या के दिन प्रशासन और पुलिस के बीच हुए विवाद के बाद शुरू हुआ था। उस दिन उन्होंने पालकी में संगम की ओर जाते समय अचानक बाधा का सामना किया और कथित रूप से स्नान करने से रोके जाने का आरोप लगाया गया। इसके बाद से वे अपने आश्रम के बाहर ही विरोध के रूप में बैठे रहे।
विदा की घोषणा करते हुए स्वामी ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि उन्हें इस पवित्र स्थान से बिना स्नान के लौटना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि मन भीगा हुआ और शब्दों में भाव व्यक्त करना कठिन है, क्योंकि उनका उद्देश्य तो संगम तट पर श्रद्धा और शांति के साथ स्नान करना था। माघ मेले की पवित्रता को लेकर उनकी गहरी आस्था है, लेकिन आंतरिक पीड़ा और घटनाओं से उत्पन्न भावनात्मक झकझोर ने उन्हें ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया।
स्वामी ने यह भी कहा कि वह प्रयागराज की इस पवित्र धरती पर शांति और आध्यात्मिक आनन्द पाने आए थे, लेकिन अब उन्हें रिक्तता की अनुभूति हो रही है और वे काशी की ओर रवाना हो रहे हैं। उन्होंने प्रशासन के प्रस्ताव—जिसमें उन्हें सम्मान के साथ स्नान कराने का सुझाव दिया गया था—को भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनके अनुसार हृदय में व्यथित भावना के साथ पूजन पूरा नहीं हो सकता।
प्रशासन ने इस मुद्दे को भी गंभीरता से संभाला और कुछ आरक्षित मुद्दों पर नोटिस भी जारी किया था, लेकिन विवाद बढ़ता गया। इस पूरे प्रकरण ने धार्मिक गतिविधियों, आयोजन प्रबंधन और श्रद्धालुओं के अधिकारों पर कई गहन सवाल उठा दिए हैं, जिनके जवाब अभी समाज और प्रशासन दोनों से अपेक्षित हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यह प्रतिक्रिया और उनका माघ मेला से जाना धार्मिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है, जिससे न केवल धार्मिक समुदाय बल्कि आम जनता का ध्यान भी इस पर मंत्रमुग्ध है।