अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जगत में ग्रीनलैंड को अक्सर एक शांत, बर्फीला और अप्रयुक्त क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। लेकिन 28 जनवरी 2026 के नवीनतम खुलासों के अनुसार, अमेरिका का ग्रीनलैंड को लेकर एक गुप्त और विवादित योजना लंबे समय से तैयार थी — जिसमें बर्फ की मोटी चादर के नीचे लगभग 600 न्यूक्लियर मिसाइलें छिपाने का विचार शामिल था। यह जानकारी हाल ही में एक मास्टरमाइंड सुरक्षा विश्लेषण और दस्तावेजों के रिसाव के तौर पर सामने आई, जिसने वैश्विक रणनीतिक संतुलन के बारे में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
❄️ डर्टी सीक्रेट: कैसे उभरी यह योजना?
1960 और 1970 के दशक में शीत युद्ध की चपेट में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु शक्ति संतुलन को लेकर तेज़ प्रतिस्पर्धा थी। इस दौर में अमेरिका ने उत्तरी अर्द्धगोलीय क्षेत्रों में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की रणनीति बनाई। ग्रीनलैंड, जो यू.एस. के लिए नाटो सहयोगी डेनमार्क का अटैच्ड क्षेत्र है, अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। ऐसी कुछ गोपनीय सैन्य योजनाओं में बर्फ की मोटी परत के नीचे मिसाइलों को छिपाने की बात कही गई थी ताकि संभावित हमले की स्थिति में पलटवार किया जा सके।
हालांकि आधिकारिक स्तर पर कोई भी पुष्टि नहीं की गई, लेकिन रिसाव हुए दस्तावेजों और सैन्य विश्लेषकों की रिपोर्ट में इस योजना का विवरण मिलता है। दस्तावेजों के अनुसार यह योजना इतनी गोपनीय थी कि इसका जिक्र केवल उच्च सैन्य अधिकारियों और कुछ चुने हुए नीति निर्माताओं के बीच ही रखा गया था।
🧊 600 मिसाइलें क्यों और कहाँ?
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की रणनीति यह थी कि ग्रीनलैंड के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में बर्फ की मोटी परत के नीचे मिसाइल साइलोज़ स्थापित किए जाएं, जिनमें लगभग 600 न्यूक्लियर मिसाइलें स्टोर की जा सकें। इसका उद्देश्य था कि यदि किसी परमाणु युद्ध की स्थिति उत्पन्न हुई, तो ये मिसाइलें छिपी हुई स्थिति से अचानक सक्रिय की जा सकें, जिससे अमेरिका को रणनीतिक बढ़त मिले।
विश्लेषकों ने बताया कि उस समय बर्फ की मोटी परत और कठोर मौसम की वजह से इन साइलोज़ की स्थिति और ऑपरेशनल सुरक्षा अन्य स्थानों की तुलना में बेहतर समझी जाती थी। इसके अलावा, रडार और उपग्रह निगरानी तकनीक सीमित थी, जिससे अपेक्षा थी कि मिसाइलें छुपी रह सकती हैं।
🚨 वैश्विक प्रतिक्रिया और सुरक्षा चिंता
जब यह जानकारी सार्वजनिक हुई, तो दुनिया भर के सुरक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिक हलकों में चिंता और आलोचना की लहर दौड़ गई। कई विश्लेषकों ने कहा कि इस तरह की योजनाएँ वैश्विक परमाणु सुरक्षा समझौतों के खिलाफ जा सकती हैं और विश्व शांति को खतरे में डाल सकती हैं।
कुछ रणनीतिकविदों ने यह भी कहा कि शीत युद्ध के इस तरह के गुप्त खेल अब पुरानी सोच का प्रतीक हैं और आज के वैश्विक सुरक्षा ढांचे में इन्हें फिर से लागू करने का कोई तर्क नहीं है। वहीं, कुछ पत्रकार और इतिहासकार इसे ऐतिहासिक रणनीति और उस दौर की पृष्ठभूमि के रूप में देखते हैं, जहां प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच हर संभव तकनीकी और सामरिक लाभ उठाने की होड़ थी।
🧠 क्या यह योजना कभी लागू हुई?
अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि क्या यह योजना कभी पूर्ण रूप से लागू हुई थी या केवल कागज़ों में ही सीमित रही। अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रणनीतियाँ अक्सर गुप्त रखी जाती हैं और इनके बारे में विदेशों को अधिकतम जानकारी नहीं दी जाती।