26 जनवरी 2026 को भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा के साथ कई गुमनाम नायकों को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया। उन युगलों में दो ऐसे प्रेरणास्पद चेहरे शामिल हैं जिन्होंने समाज, संस्कृति और परंपरा की सेवा में अपना समर्पित जीवन व्यतीत किया है — भगवानदास रायकवार और बुधरी ताती।
1. बुंदेली युद्ध कला के संरक्षक — भगवानदास रायकवार
मध्य प्रदेश के सागर से संबंध रखने वाले 83 वर्षीय भगवानदास रायकवार को बुंदेली युद्ध कला और पारंपरिक मार्शल आर्ट के संरक्षण और संवर्धन के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। उन्होंने अपनी बैंक की नौकरी छोड़कर 1982 में इस कला को बचाने का कठिन निर्णय लिया और तब से यह परंपरा लुप्त होने से बचाई।
बुंदेली मार्शल आर्ट केवल शारीरिक कौशल नहीं बल्कि संस्कृति, अनुशासन और लोक विरासत का प्रतीक है, जिसे रायकवार ने अखाड़ा के ज़रिये नई पीढ़ी तक पहुँचाया। उन्होंने प्राचीन शस्त्र विद्या — लाठी, भाला, तलवार, त्रिशूल आदि — के प्रशिक्षण को देश भर के मंचों पर प्रस्तुत किया, जिससे बुंदेलखंड की परंपरा को राष्ट्रीय पहचान मिली। उनका समर्पण इसे सिर्फ कला के रूप में नहीं बल्कि जीवन दर्शन और सांस्कृतिक पहचान के तौर पर सँभालता है।
2. समाज सेवा की दीदार — छत्तीसगढ़ की बुधरी ताती
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा क्षेत्र की समाजसेविका बुधरी ताती को भी पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्हें नक्सल प्रभावित और दूरदराज़ इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और समाज सुधार के लिए उनके दशकों लंबे योगदान के लिए यह सम्मान मिला है।
बुधरी ने सीमित संसाधनों के बावजूद आदिवासी समुदायों और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए योग्यता प्रशिक्षण, स्वरोजगार लोगों को जोड़ने, नशा मुक्ति जागरूकता जैसे जमीनी स्तर के कार्यक्रम संचालित किए। स्थानीय लोग उन्हें स्नेह से “बड़ी दीदी” कहते हैं, क्योंकि उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में मदद की है और समाज में सकारात्मक बदलाव लाया है।
गुमनाम लेकिन महान
इन दोनों हस्तियों का जीवन संदेश यही है कि प्रमोचन या शो-बाज़ी के बिना भी असाधारण कार्य देश और समाज को बदल सकते हैं। भगवानदास और बुधरी की साधना और सेवा ने उन्हें न सिर्फ सम्मान दिलाया, बल्कि अनगिनत लोगों की ज़िंदगी में सकारात्मक प्रभाव भी छोड़ा है।