27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर आधिकारिक घोषणा कर दी गई है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। इस समझौते का व्यापक अर्थ है कि यह न सिर्फ दोनों पक्षों की आर्थिक साझेदारी को गहरा करेगा बल्कि वैश्विक व्यापार और जीडीपी के संतुलन पर भी बड़ा प्रभाव डालेगा।
सबसे पहले आंकड़ों की बात करें तो इस समझौते की सीमा इतनी विशाल है कि भारत और EU मिलकर लगभग 25% वैश्विक GDP तथा लगभग एक-तिहाई वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे लगभग 2 अरब लोगों का बड़ा बाज़ार तैयार होगा, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का मुक्त व्यापार संभव होगा।
📈 समझौता क्यों ऐतिहासिक?
यह डील पिछले 18 वर्षों की वार्ता के बाद सफल हुई है, जिसमें कथित रूप से कई जटिल मुद्दों पर संतुलन स्थापित किया गया है। भारत और EU ने 90% से अधिक व्यापारिक वस्तुओं पर टैरिफ को कम या समाप्त करने का निर्णय लिया है, जिससे दोनों पक्षों के निर्यात-आयात को प्रोत्साहन मिलेगा। उदाहरण के तौर पर:
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भारतीय वस्तुओं जैसे कपड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रसायन आदि को EU बाजार में ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी।
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यूरोपीय कारों और शराब जैसे आयात पर भारत में लागू टैरिफ क्रमशः सालों में घटकर काफी कम होगा, जिससे ये वस्तुएँ सस्ती होंगी।
🇺🇸 ट्रंप की व्यापार नीति को चुनौती
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह समझौता यूनाइटेड स्टेट्स के ट्रेड दबाव और उच्च टैरिफ नीतियों की पृष्ठभूमि में आया है। विशेषकर अमेरिकी राष्ट्रपति और प्रशासन द्वारा यूरोपीय साझेदारों पर व्यापार दबाव के बीच यह समझौता एक पर्याय चुनौतिपूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जो वैश्विक व्यापार संतुलन को पुनः आकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
🤝 दोनों पक्षों के लिए फायदे
भारत को बड़े यूरोपीय बाजारों में अपनी एक्सपोर्ट पहुंच मजबूत करने का मौका मिलेगा और EU कंपनियों को भारत में निवेश और व्यापार के नए अवसर मिलेंगे। यह समझौता न केवल व्यापार को बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को भी और मज़बूत करेगा, जिससे आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा।