पश्चिम एशिया एक बार फिर गंभीर तनाव के दौर से गुजर रहा है। क्षेत्र पर जंग के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में होने जा रही अहम वार्ता को हालात बदलने वाला मोड़ माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बातचीत पर टिकी हैं, क्योंकि इसके नाकाम रहने की स्थिति में पूरे पश्चिम एशिया में संघर्ष की आग फैलने का खतरा जताया जा रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनातनी बनी हुई है। पिछले कुछ महीनों में हालात और बिगड़े हैं। गाजा युद्ध, लाल सागर में हमले, इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन व रॉकेट हमले और ईरान समर्थित गुटों की बढ़ती सक्रियता ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। ऐसे में ओमान में होने वाली यह वार्ता बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, इस बातचीत का मुख्य फोकस ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में संभावित राहत और क्षेत्रीय तनाव को कम करने पर रहेगा। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन की गति पर लगाम लगाए, जबकि ईरान की मांग है कि उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों में ठोस ढील दी जाए। दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी इस वार्ता की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह बातचीत विफल होती है, तो इसके असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। इजरायल, सऊदी अरब, यूएई, इराक, सीरिया और लेबनान जैसे देश भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इजरायल पहले ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कड़ा रुख अपनाए हुए है और सैन्य कार्रवाई के संकेत देता रहा है। वहीं ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह और हूती जैसे संगठन किसी भी बड़े टकराव की स्थिति में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर भी खतरा बढ़ सकता है। यदि तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है, जिसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार और ऊर्जा कीमतों पर पड़ेगा। भारत सहित कई देश इस क्षेत्र से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं, ऐसे में हालात बिगड़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।
ओमान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जाती है। इससे पहले भी ओमान अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल डिप्लोमेसी का मंच बनता रहा है। कूटनीतिक हल निकालने की यह कोशिश अगर सफल होती है, तो पश्चिम एशिया को एक बड़े संघर्ष से राहत मिल सकती है।
कुल मिलाकर, आज की वार्ता सिर्फ दो देशों के रिश्तों का मामला नहीं है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता इससे जुड़ी हुई है। बातचीत की सफलता या विफलता आने वाले दिनों में यह तय कर सकती है कि क्षेत्र शांति की राह पर बढ़ेगा या एक और बड़े युद्ध की ओर।