भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः इस में कोई दो राय नहीं है कि दीपावली हमारे देश के सबसे लोकप्रिय और उल्लासपूर्ण त्योहारों में से एक है। रोशनी, खुशियों, उत्साह और आपसी प्रेम का यह पर्व हर भारतीय के जीवन में नई उमंग और सकारात्मकता लेकर आता है। घरों की सजावट, दीपों की जगमगाहट, रंगोली, मिठाइयां, पूजा-पाठ और परिवार के साथ बिताए जाने वाले यादगार पल इस त्योहार को विशेष बनाते हैं। दीपावली हमें अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है। लेकिन समय के साथ त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। पटाखों का बढ़ता शोर, वायु प्रदूषण, आतिशबाजी और सुरक्षा के प्रति लापरवाही कई बार इस पावन पर्व की वास्तविक भावना को प्रभावित करती है। ऐसे में प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह दीपावली को प्रदूषण मुक्त, शोर रहित और सुरक्षित बनाने में अपना योगदान दे।
दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल पटाखे जलाना नहीं, बल्कि अपने जीवन में सकारात्मकता लाना और दूसरों के साथ खुशियां बांटना है। हमारी खुशियां तभी सार्थक हैं, जब उनसे किसी दूसरे को परेशानी न हो। मिट्टी के दीये जलाकर, घरों को सजाकर, सुंदर रंगोली बनाकर, परिवार और मित्रों के साथ समय बिताकर तथा जरूरतमंदों की सहायता करके भी इस पर्व को यादगार बनाया जा सकता है। तेज आवाज वाले पटाखों और अनावश्यक आतिशबाजी के बिना भी दीपावली पूरे उत्साह से मनाई जा सकती है।
इस त्योहार के दौरान सबसे बड़ी चिंता वायु प्रदूषण को लेकर रहती है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और रासायनिक पदार्थ वातावरण में हानिकारक गैसों तथा सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ा सकते हैं। इसका असर विशेष रूप से सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। सर्दियों की शुरुआत के साथ देश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता पहले ही चिंता का विषय बन जाती है। ऐसे में अनावश्यक आतिशबाजी प्रदूषण की समस्या को और गंभीर कर सकती है। कुछ घंटों के मनोरंजन के लिए अपने और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को खतरे में डालना समझदारी नहीं है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए हरित दीपावली मनाना समय की मांग है।
वायु प्रदूषण के साथ ध्वनि प्रदूषण भी गंभीर समस्या है। तेज धमाकों और लगातार पटाखे फोड़ने से छोटे बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पालतू पशुओं को परेशानी होती है। कई परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता ऐसे होते हैं, जिन्हें शांत वातावरण और आराम की आवश्यकता होती है। छोटे बच्चे अचानक होने वाली तेज आवाज से डर जाते हैं। अस्पतालों में उपचार करा रहे मरीजों और परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए भी पटाखों का शोर परेशानी पैदा कर सकता है। हमें समझना होगा कि त्योहार मनाने का अधिकार सभी को है, लेकिन किसी दूसरे की शांति और सुविधा छीनने का अधिकार किसी को नहीं है।
दीपावली पर महिलाओं की सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखना भी जरूरी है। त्योहार की तैयारियों में महिलाओं पर अक्सर अतिरिक्त जिम्मेदारियां आ जाती हैं। परिवार के सभी सदस्यों को घरेलू कामकाज में सहयोग करना चाहिए, ताकि महिलाएं भी बिना तनाव के उत्सव का आनंद उठा सकें। आतिशबाजी के दौरान बच्चों, महिलाओं और आसपास के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। सड़कों, गलियों, वाहनों के पास, घरों के प्रवेश द्वारों और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर पटाखे फोड़ना गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है। किसी की लापरवाही से दूसरे परिवार की खुशियां खराब नहीं होनी चाहिए।
पटाखों से होने वाली दुर्घटनाएं भी हर वर्ष चिंता का विषय बनती हैं। थोड़ी-सी असावधानी से आग लगने, हाथ-पैर जलने और आंखों में चोट लगने जैसी घटनाएं हो सकती हैं। बच्चों को कभी भी अकेले पटाखे जलाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। यदि आतिशबाजी की जाती है, तो स्थानीय प्रशासन के नियमों, न्यायालयों के निर्देशों और निर्धारित समय-सीमा का पालन करना चाहिए। केवल कानूनी रूप से अनुमत पटाखों का सुरक्षित स्थान पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पटाखे जलाते समय उचित दूरी बनाए रखना, सूती कपड़े पहनना तथा पानी और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था रखना जरूरी है। गैस सिलेंडर, पेट्रोल, वाहनों और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं के आसपास आतिशबाजी से पूरी तरह बचना चाहिए। दुर्घटना होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
दीपावली हमें सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं का भी संदेश देती है। हमारे आसपास कोई बुजुर्ग बीमार हो सकता है, कोई बच्चा परीक्षा की तैयारी कर रहा हो सकता है या कोई व्यक्ति उपचार के बाद घर पर आराम कर रहा हो सकता है। ऐसे में देर रात तक तेज आवाज वाले पटाखे जलाकर उन्हें परेशान करना उचित नहीं है। पड़ोसियों की सुविधा, सुरक्षा और भावनाओं का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है। त्योहारों का उद्देश्य प्रेम और भाईचारे को मजबूत करना है, न कि शोर और असुविधा पैदा करना।
इस अवसर को सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ना चाहिए। जरूरतमंद परिवारों के साथ मिठाइयां और खुशियां बांटना, गरीब बच्चों को कपड़े और किताबें देना तथा अकेले रहने वाले बुजुर्गों के साथ समय बिताना दीपावली की खुशियों को और सार्थक बना सकता है। मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कुम्हारों और छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहित करना भी सराहनीय कदम है। प्लास्टिक की सजावट और अनावश्यक कचरे से बचते हुए पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल करना चाहिए।
प्रदूषण और ध्वनि की समस्या का समाधान केवल सरकार और प्रशासन के प्रयासों से संभव नहीं है। इसमें नागरिकों की जागरूकता और सहयोग सबसे महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा का महत्व समझाना चाहिए। स्कूलों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और मीडिया को भी हरित दीपावली का संदेश जन-जन तक पहुंचाना चाहिए।
अंततः दीपावली का वास्तविक सौंदर्य पटाखों के धमाकों में नहीं, बल्कि घरों में जलते दीपों, चेहरों पर खिलती मुस्कान और दिलों में बसे प्रेम में है। हमें ऐसी दीपावली मनानी चाहिए, जिसमें बच्चे भयमुक्त रहें, बुजुर्ग माता-पिता शांति से समय बिता सकें, महिलाएं सुरक्षित महसूस करें और किसी परिवार की खुशियां दुर्घटना या प्रदूषण की भेंट न चढ़ें। हमारी खुशियां तभी उचित हैं, जब उनसे दूसरों के अधिकारों और सुविधाओं का हनन न हो।
आइए, इस दीपावली पर संकल्प लें कि पटाखों के अनावश्यक शोर और धुएं के बजाय प्रेम, सेवा, सद्भाव और रोशनी से त्योहार मनाएंगे। पर्यावरण को स्वच्छ रखने, जरूरतमंदों की सहायता करने और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने को प्राथमिकता देंगे। याद रखिए, सबसे सुंदर दीपावली वही है, जिसमें हर घर रोशन हो, हर चेहरा मुस्कुराए, वातावरण स्वच्छ रहे और किसी की खुशी किसी दूसरे की परेशानी का कारण न बने।