भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः नवंबर की शुरुआत के साथ ही दिल्ली और उत्तर भारत के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण का संकट एक बार फिर गहराने लगा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हवा ‘बेहद खराब’ श्रेणी में पहुंचने से लोगों की चिंताएं बढ़ गई हैं। सुबह और शाम के समय धुंध की मोटी परत, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें आम होती जा रही हैं। दिल्ली-NCR के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में भी वायु गुणवत्ता में गिरावट दर्ज की जा रही है। हर साल सर्दियों के आगमन के साथ पैदा होने वाला यह संकट अब एक नियमित मौसमी घटना बनता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक देश की राजधानी और आसपास के करोड़ों लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर रहेंगे और कब सरकारें इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशेंगी?
वायु गुणवत्ता सूचकांक का ‘बेहद खराब’ श्रेणी में पहुंचना सामान्य स्थिति नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार, वायु गुणवत्ता सूचकांक 301 से 400 के बीच होने पर हवा को ‘बेहद खराब’ माना जाता है। इस स्तर पर लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से स्वस्थ लोगों को भी सांस संबंधी परेशानियां हो सकती हैं, जबकि पहले से बीमार लोगों की स्थिति और बिगड़ सकती है। दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले महानगर में प्रदूषण का बढ़ता स्तर केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और अस्थमा तथा हृदय रोग से पीड़ित लोगों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
इस समस्या की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसके कारण किसी से छिपे नहीं हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, खुले में कचरा जलाना और खेतों में पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषण बढ़ाने में योगदान देती हैं। इसके अलावा, सर्दियों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां समस्या को और गंभीर बना देती हैं। तापमान में गिरावट, हवा की धीमी गति और वातावरण में नमी के कारण प्रदूषक कण आसानी से बिखर नहीं पाते और जमीन के आसपास जमा होने लगते हैं। परिणामस्वरूप दिल्ली-NCR सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में धुंध और प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाला उत्सर्जन भी कुछ समय के लिए स्थिति को और खराब कर सकता है।
हालांकि, हर साल प्रदूषण के लिए पराली जलाने को प्रमुख कारण बताकर बहस शुरू हो जाती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि समस्या बहुआयामी है। केवल किसानों को दोषी ठहराने या किसी एक राज्य पर जिम्मेदारी डालने से समाधान नहीं निकलेगा। दिल्ली के भीतर वाहनों की भारी संख्या, डीजल से चलने वाले पुराने वाहन, औद्योगिक इकाइयां, सड़क की धूल और निर्माण गतिविधियां भी प्रदूषण के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसलिए जरूरी है कि सभी स्रोतों की पहचान वैज्ञानिक तरीके से की जाए और उनके अनुसार प्रभावी कदम उठाए जाएं। प्रदूषण की समस्या का राजनीतिकरण करने के बजाय केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को साझा जिम्मेदारी निभानी होगी।
वायु प्रदूषण का सबसे खतरनाक पहलू इसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रभाव है। हवा में मौजूद PM2.5 जैसे बेहद सूक्ष्म कण सांस के साथ फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्त प्रवाह को भी प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। बच्चों के शारीरिक विकास और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों को खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन, सांस फूलने और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव डालती है और परिवारों के चिकित्सा खर्च में भी वृद्धि करती है। स्वच्छ हवा में सांस लेना किसी की विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।
सरकारें हर साल प्रदूषण नियंत्रण के लिए कई उपायों की घोषणा करती हैं। दिल्ली में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के तहत प्रदूषण के स्तर के अनुसार अलग-अलग प्रतिबंध लागू किए जाते हैं। निर्माण कार्यों पर निगरानी, सड़कों पर पानी का छिड़काव, धूल नियंत्रण, वाहनों की जांच और औद्योगिक उत्सर्जन पर कार्रवाई जैसे कदम उठाए जाते हैं। लेकिन इन उपायों का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब इनका ईमानदारी से और लगातार पालन कराया जाए। केवल प्रदूषण बढ़ने पर आपातकालीन प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। जरूरत इस बात की है कि प्रदूषण नियंत्रण को पूरे वर्ष की प्राथमिकता बनाया जाए।
वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। दिल्ली-NCR में बसों और मेट्रो सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ईंधन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पुराने और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए और सड़कों की नियमित मशीनीकृत सफाई सुनिश्चित की जाए। औद्योगिक इकाइयों को निर्धारित उत्सर्जन मानकों का पालन करना चाहिए तथा नियम तोड़ने वालों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई होनी चाहिए।
पराली प्रबंधन के मामले में भी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। किसानों को फसल अवशेषों के निस्तारण के लिए आधुनिक मशीनें, आर्थिक सहायता और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। पराली से जैव ईंधन, खाद और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने से किसानों को अतिरिक्त आय भी मिल सकती है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को केंद्र के साथ मिलकर एक साझा कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए, ताकि समस्या का समाधान खेत से लेकर शहर तक सुनिश्चित किया जा सके।
आम नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। निजी वाहनों का अनावश्यक इस्तेमाल कम करना, कार पूलिंग अपनाना, कचरा नहीं जलाना और सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करना प्रदूषण नियंत्रण में मददगार हो सकता है। हालांकि, नागरिकों से सहयोग की अपेक्षा करने के साथ सरकारों को उन्हें बेहतर सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।
अब समय आ गया है कि वायु प्रदूषण को केवल नवंबर-दिसंबर की मौसमी समस्या समझने की सोच बदली जाए। दिल्ली और उत्तर भारत की जहरीली होती हवा सरकारों, प्रशासन और समाज सभी के लिए चेतावनी है। राजनीतिक बयानबाजी और अस्थायी उपायों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक योजना, सख्त निगरानी और जवाबदेही तय करनी होगी। विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब लोगों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित वातावरण और स्वस्थ जीवन मिल सके। आखिरकार, नागरिकों को सांस लेने के लिए साफ हवा उपलब्ध कराना किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है।