भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा दृश्य कम ही देखने को मिलता है। जिन मीडिया समूहों की आपस में कारोबारी होड़ जगज़ाहिर है, वे एक ही मुद्दे पर एक कतार में खड़े हो गए हैं। दस्तावेज़ों के मुताबिक़ 21 समाचार प्रकाशकों ने देश के निजता क़ानून को अदालत में चुनौती दी है। इनमें अरबपति मुकेश अंबानी और गौतम अडाणी के स्वामित्व वाली कंपनियाँ भी शामिल हैं। इन प्रकाशकों की दलील है कि यह क़ानून खोजी पत्रकारिता को कुचल सकता है और सरकार को पत्रकारों के सूत्रों तक पहुँचने का रास्ता दे सकता है।
ज़रा ठहरकर सोचिए। जब सत्ता के गलियारों से लेकर कारोबार की दुनिया तक के लोग एक ही चिंता जता रहे हों, तो मामला मामूली नहीं हो सकता।
यह मामला डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण क़ानून से जुड़ा है, जिसका घोषित मक़सद नागरिकों की निजी जानकारी को सुरक्षित रखना है। सरकार का कहना है कि क़ानून निजता की रक्षा करता है और रिपोर्टिंग के लिए सीमित छूट भी देता है। सुनने में यह बात बिल्कुल जायज़ लगती है। आज के दौर में कौन नहीं चाहेगा कि उसका मोबाइल नंबर, पता और बैंक ब्योरा बाज़ार में न बिके?
लेकिन आलोचकों का तर्क है कि समस्या नीयत में नहीं, बनावट में है। रिपोर्टों के अनुसार इस क़ानून में नियम तोड़ने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है, जो क़रीब 2.7 करोड़ डॉलर तक जा सकता है, और पत्रकारों के लिए कोई साफ़ और अलग छूट नहीं दी गई है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया पहले ही चेता चुका है कि इससे ख़बरें जुटाने की प्रक्रिया पर "ठंडा असर" पड़ सकता है और जवाबदेही वाली पत्रकारिता में बाधा आ सकती है।
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू पत्रकारों के सूत्र हैं। हर बड़े घोटाले की परतें किसी ऐसे व्यक्ति की बदौलत खुलती हैं, जो भीतर की सच्चाई जानता है लेकिन अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं कर सकता। वह नौकरी, सुरक्षा या शायद जान का जोखिम उठाकर बोलता है, और उसे यह भरोसा होता है कि पत्रकार उसका नाम कभी उजागर नहीं करेगा।
अब कल्पना कीजिए कि इस भरोसे की नींव ही हिल जाए। अगर सूत्रों को यह डर सताने लगे कि सरकार आसानी से पता लगा सकती है कि जानकारी किसने दी, तो वे चुप्पी साध लेंगे। नुक़सान किसी एक अख़बार या चैनल का नहीं होगा, बल्कि उस आम पाठक का होगा जिसे सच जानने का हक़ है। प्रकाशकों की यही आशंका उन्हें अदालत तक खींच लाई है।
मामला सिर्फ़ सूत्रों तक सीमित नहीं है। इस क़ानून के साथ सूचना का अधिकार अधिनियम में भी एक पंक्ति का संशोधन लागू हुआ, जिसके तहत किसी भी "व्यक्तिगत जानकारी" को सार्वजनिक करने से छूट मिल जाती है। पत्रकारों और पारदर्शिता कार्यकर्ताओं को डर है कि अफ़सर इस प्रावधान की आड़ लेकर जनहित की जानकारी भी रोक सकते हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव जैसे संगठन इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं और कह चुके हैं कि भारी जुर्माने के डर से नागरिक और पत्रकार ख़ुद पर सेंसर लगाने को मजबूर होंगे।
इस ख़बर का सबसे चौंकाने वाला पहलू याचिकाकर्ताओं की सूची है। अंबानी और अडाणी जैसे नाम आमतौर पर सत्ता से नज़दीकी को लेकर चर्चा में रहते हैं, और अडाणी समूह की कंपनियाँ पत्रकारों के ख़िलाफ़ मानहानि के मुक़दमों के कारण पहले भी सुर्ख़ियों में रह चुकी हैं। ऐसे में इन्हीं समूहों का पत्रकारिता की आज़ादी के पक्ष में खड़ा होना कई सवाल खड़े करता है।
क्या यह वाक़ई प्रेस की स्वतंत्रता की चिंता है? या फिर क़ानून का बोझ और जुर्माने का ख़तरा कारोबारी हितों पर भी भारी पड़ रहा है? सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है। पर इससे मुद्दे की गंभीरता कम नहीं होती। वजह जो भी हो, जब इतने बड़े घराने एकजुट होकर कह रहे हैं कि यह क़ानून ख़बर की आज़ादी पर चोट करता है, तो इसे अनसुना करना आसान नहीं।
अब गेंद अदालत और सरकार दोनों के पाले में है। सरकार को यह साबित करना होगा कि निजता की रक्षा और प्रेस की आज़ादी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अगर रिपोर्टिंग के लिए छूट सचमुच मौजूद है, तो उसे स्पष्ट शब्दों में क़ानून का हिस्सा बनाने में क्या हर्ज है? पारदर्शिता का सबसे अच्छा जवाब अस्पष्टता नहीं, स्पष्टता होती है।
लोकतंत्र की सेहत इस बात से नहीं मापी जाती कि सरकारें कितनी ताक़तवर हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उनसे सवाल पूछने वाले कितने सुरक्षित हैं। निजता हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन सच जानने का हक़ भी उतना ही अहम है। इन दोनों के बीच संतुलन बिठाना ही असली चुनौती है।
अदालत का फ़ैसला जो भी आए, यह मामला हमें एक असुविधाजनक सवाल के सामने खड़ा करता है: अगर ख़बर देने वालों की गोपनीयता ही सुरक्षित न रही, तो फिर हमें सच कौन बताएगा?