भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः लोकतंत्र की असली ताकत जनता की भागीदारी और मतदान के अधिकार में निहित है। मतदाता सूची केवल नामों का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों का आधार है। ऐसे में दिल्ली की प्रारूप मतदाता सूची से लगभग 47.6 लाख नाम हटने और इसके बाद नाम शामिल कराने के लिए अपेक्षाकृत कम आवेदन आने का मामला गंभीर सवाल खड़े करता है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के अनुसार, 31 अगस्त 2026 को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद 22 अक्टूबर तक फॉर्म-6 के 2,50,754 आवेदन प्राप्त हुए। सवाल यह है कि क्या यह मतदाता जागरूकता की कमी है या इसके पीछे दूसरे कारण भी हैं?
निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, पुनरीक्षण से पहले दिल्ली में लगभग 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे, जबकि 31 अगस्त को जारी प्रारूप सूची में करीब 97.54 लाख नाम शामिल किए गए। इस तरह लगभग 47.57 लाख नाम प्रारूप सूची में नहीं रहे। इन्हें अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि जैसी श्रेणियों में रखा गया। मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए सत्यापन जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, एक ही मतदाता की दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करना और स्थानांतरित लोगों का रिकॉर्ड अपडेट करना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ा सकता है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न हटे और वह अपने मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए।
फॉर्म-6 के 2,50,754 आवेदन आने का आंकड़ा भी सावधानी से समझने की जरूरत है। इनमें पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों के साथ वे लोग भी शामिल हैं, जो सूची में नाम जुड़वाना चाहते हैं। इसके अलावा, 31 अगस्त से पहले भी फॉर्म-6 के 2,12,400 आवेदन प्राप्त हुए थे। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सूची से हटाए गए सभी लोग नाम दोबारा जुड़वाने के लिए आवेदन करने से बच रहे हैं। कुछ लोग दिल्ली से दूसरे शहरों में जा चुके होंगे, जबकि कुछ के नाम दूसरी जगह दर्ज हो सकते हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद अपेक्षाकृत कम आवेदन आना इस बात की पड़ताल जरूरी बनाता है कि पात्र नागरिकों तक जानकारी कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रही है।
दिल्ली जैसे महानगर में नौकरी, शिक्षा और किराये के मकानों के कारण लोगों का लगातार स्थान बदलना आम है। कई बार पते में बदलाव, दस्तावेजों की कमी या प्रक्रिया की जानकारी न होने से भी नागरिकों को परेशानी होती है। ऐसे में केवल शिविर लगाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा। बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) को घर-घर जाकर जानकारी देने, प्रभावित मतदाताओं की समस्याएं सुनने और आवेदन भरने में सहायता करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों, प्रवासी कामगारों और डिजिटल सुविधाओं से वंचित लोगों के लिए अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था भी जरूरी है।
निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, इस अवधि में दिल्ली में लगभग 89,000 विशेष शिविर लगाए गए। इसके बावजूद कम आवेदन संख्या पर चिंता होना स्वाभाविक है। निर्वाचन आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि कितने नाम किस कारण से हटाए गए, कितने पात्र मतदाताओं ने दोबारा आवेदन किया और कितने आवेदन स्वीकार या लंबित हैं। जिन नागरिकों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उन्हें अपनी स्थिति जांचने और दावा प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। पारदर्शी प्रक्रिया और समयबद्ध सुनवाई से ही नागरिकों का भरोसा कायम रह सकता है।
इस मामले में राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय प्रतिनिधियों और मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची की शुद्धता केवल निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिक जागरूकता से जुड़ा विषय भी है। प्रत्येक पात्र मतदाता को अपना नाम सूची में जांचना चाहिए। नाम नहीं मिलने पर निर्वाचन विभाग के आधिकारिक माध्यमों से जानकारी लेकर उचित आवेदन करना चाहिए। साथ ही, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी परेशानी, जानकारी के अभाव या दस्तावेजी जटिलताओं के कारण किसी का अधिकार प्रभावित न हो।
अंततः, मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाना और हर पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दो अनिवार्य आधार हैं। लगभग 47.6 लाख नामों का प्रारूप सूची में शामिल न होना और इसके बाद प्राप्त आवेदनों की संख्या निर्वाचन व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का अवसर है। जरूरत ऐसी प्रक्रिया की है, जिसमें गलत प्रविष्टियां हटें, लेकिन वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सुरक्षित रहें। लोकतंत्र की मजबूती केवल मतदाता सूची की शुद्धता से नहीं, बल्कि इस भरोसे से तय होती है कि किसी भी पात्र नागरिक की आवाज और उसका वोट अनदेखा नहीं होगा।