भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः क्या वह घड़ी सचमुच आ गई है, जिसका इंतज़ार भारत के कारोबारी, किसान, निर्यातक और आम उपभोक्ता पिछले एक साल से कर रहे थे? अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भरोसे के साथ कहा है कि भारत के साथ व्यापार समझौता अब अंतिम चरण में है। इस बयान से दिल्ली से वॉशिंगटन तक हलचल है। जो रिश्ता कल तक टैरिफ़ की खींचतान में उलझा दिखता था, उसके बारे में अब कहा जा रहा है कि मंज़िल बस चंद क़दम दूर है। सवाल यह है कि इस बार बात सच में बन रही है, या यह एक और उम्मीद भरा बयान भर है?
पहले पीछे चलते हैं। बीते साल अमेरिका ने भारतीय सामान पर भारी शुल्क लगा दिए थे। एक समय यह कुल 50 प्रतिशत तक पहुँच गया था, जिसमें 25 प्रतिशत का हिस्सा रूस से तेल और व्यापार के कारण लगाई गई सज़ा का था। इसका असर कपड़ा, रत्न-आभूषण और समुद्री उत्पाद जैसे उन क्षेत्रों पर पड़ा, जिन पर लाखों परिवारों की रोज़ी टिकी है। भारत ने इसे अन्याय बताया, तो अमेरिका ने इसे व्यापार संतुलन ठीक करने की कोशिश कहा। दोनों देश दोस्ती का दावा करते रहे, मगर कारोबारी माहौल में बेचैनी बनी रही।
फिर फ़रवरी में मोड़ आया। ट्रंप ने रूसी तेल वाला दंडात्मक शुल्क हटा दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत के बाद शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का ऐलान किया। उन्होंने इसे मोदी और भारत के प्रति दोस्ती और सम्मान का प्रतीक बताया। उस प्रारंभिक सहमति में भारत से अपेक्षा थी कि वह अपने बाज़ार की कुछ बाधाएँ घटाए और अमेरिकी उत्पादों की ख़रीद बढ़ाए। यानी राहत मिली, पर पूरा सौदा तब भी अधूरा रह गया।
अब मई की उस यात्रा की बात, जिसने माहौल बदला। रुबियो विदेश मंत्री बनने के बाद पहली बार चार दिन के दौरे पर भारत आए। उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से लंबी वार्ता की और प्रधानमंत्री मोदी से भी मुलाक़ात की। उन्होंने कहा कि बातचीत में "भारी प्रगति" हुई है और आने वाला समझौता दोनों देशों के लिए टिकाऊ, लाभकारी और दीर्घकालिक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल जल्द भारत आएगा। साथ ही उन्होंने सफ़ाई दी कि ट्रंप का इरादा भारत से जानबूझकर टकराव मोल लेना नहीं था। उनके मुताबिक़ यह पूरी दुनिया के साथ व्यापार का हिसाब दोबारा बैठाने की कवायद है, जिसमें यूरोप के पुराने सहयोगी भी शामिल हैं। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के साथ यह संतुलन बनाना स्वाभाविक रूप से ज़्यादा जटिल है।
यह दौरा सिर्फ़ टैरिफ़ तक सीमित नहीं था। वार्ता में ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा सहयोग और वीज़ा की चुनौतियाँ भी उठीं। आईटी क्षेत्र में छँटनी की ताज़ा लहर के बीच एच-1बी वीज़ा धारक भारतीयों की चिंता बड़ा मुद्दा है, और जयशंकर ने इसे साफ़ तौर पर रखा। रुबियो ने यह भी कहा कि चीन या पाकिस्तान से अमेरिका की बातचीत भारत की क़ीमत पर नहीं होगी। भारत के अमेरिकी पहल "पैक्स सिलिका" से जुड़ने का ज़िक्र भी हुआ, जो महत्वपूर्ण खनिजों और एआई की आपूर्ति शृंखला से जुड़ी है। नई दिल्ली में क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक ने भी संकेत दिया कि रणनीतिक मोर्चे पर दोनों देश साथ खड़े हैं। मोदी को व्हाइट हाउस आने का ट्रंप का न्योता भी इसी कड़ी का हिस्सा था।
उसके बाद के बयान इस उम्मीद को और मज़बूत करते हैं। रुबियो ने बाद में कहा कि बातचीत "आख़िरी इंच" पर है, और अमेरिका ट्रंप की भारत यात्रा की तैयारी में है, जो अगले साल की शुरुआत में हो सकती है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी सौदे को "बहुत क़रीब" बताया। अक्टूबर में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि बड़ा ढाँचा और बड़े मुद्दे तय हो चुके हैं और अब उत्पाद-स्तर की बारीकियों पर चर्चा चल रही है। उन्होंने यह भी बताया कि रुबियो जल्द फिर भारत आएँगे, जिसमें मुंबई और जामनगर के कार्यक्रम शामिल हैं।
पर यहाँ ठहरकर सोचना ज़रूरी है। "बहुत क़रीब" और "हस्ताक्षर हो गए" में फ़र्क़ होता है, और अब तक किसी ने अंतिम तारीख़ नहीं बताई। रुबियो ने भी समय-सीमा देने से परहेज़ ही किया। असली पेच अक्सर बारीकियों में होते हैं: कृषि और डेयरी बाज़ार कितना खुलेगा, किन उत्पादों पर शुल्क कितना घटेगा, और भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए कितनी रियायत देगा। यही वे बिंदु हैं जिन पर सौदे बनते भी हैं और अटकते भी हैं।
फिर भी संकेत सकारात्मक हैं। अगर यह समझौता हो गया, तो निर्यातकों को अनिश्चितता से राहत मिलेगी, निवेशकों को भरोसा मिलेगा, और दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास काफ़ी हद तक धुल सकती है। लेकिन भारत को जल्दबाज़ी में नहीं, अपनी शर्तों पर सौदा करना होगा। एक अच्छा व्यापार समझौता वही है जो किसान, छोटे उद्यमी और उपभोक्ता, तीनों के हित साधे।
तो क्या हम सचमुच एक बड़े समझौते की दहलीज़ पर खड़े हैं? इसका जवाब आने वाले हफ़्तों की वार्ताओं में मिलेगा। तब तक इतना तय है कि "टैरिफ़ युद्ध" की गर्मी अब बातचीत की नरमी में बदल रही है। उम्मीद रखिए, मगर दस्तख़त होने तक नज़र भी रखिए।