भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः देश की राजनीति में सबसे बड़े तूफ़ान अक्सर वहीं से उठते हैं, जहाँ से किसी को उम्मीद नहीं होती। अब तक चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ मोर्चा विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समूहों ने संभाल रखा था। अब उन हाथों ने भी आवाज़ बुलंद कर दी है, जो खेतों में हल चलाते हैं। किसान संगठनों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग रखी है। सवाल सीधा और चुभने वाला है: जब अन्नदाता भी लोकतंत्र के रखवालों से जवाब माँगने लगे, तो क्या सत्ता के गलियारों में बेचैनी नहीं बढ़ जानी चाहिए?
पूरा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, के इर्द-गिर्द घूमता है। विपक्ष का आरोप है कि इस कवायद में करोड़ों नाम सूची से बाहर हो गए। कुछ रिपोर्टों में यह संख्या तेरह करोड़ तक बताई गई है। चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची की सफ़ाई की सामान्य और ज़रूरी प्रक्रिया बताता रहा है। विवाद ने नया मोड़ तब लिया, जब इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग दस महीनों में कम-से-कम चौदह बार आपत्तियाँ दर्ज कराईं। रिपोर्ट के मुताबिक़ कुछ आदेश उन्हें जानकारी दिए बिना जारी हुए। यदि यह दावा सही है, तो मसला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी का नहीं, संस्था के भीतर निर्णय-प्रक्रिया की साख का बन जाता है।
किसानों के लिए यह लड़ाई दूर की कौड़ी नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा, जो दो दर्जन से अधिक किसान संगठनों का साझा मंच है, पहले ही 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन का समर्थन कर चुका है। उसकी माँगों में एसआईआर को रद्द करना, मताधिकार बहाल करना और ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ कार्रवाई शामिल हैं। राकेश टिकैत की अगुवाई वाली भारतीय किसान यूनियन भी इस आंदोलन के साथ खड़ी दिखी। हरियाणा के करनाल में हुई बैठक के बाद मोर्चे ने 23 अक्टूबर को देशभर में प्रदर्शन और दिल्ली कूच का एलान किया। तर्क सरल है: जिस किसान ने तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ लंबा संघर्ष किया, वह यह कैसे सह ले कि उसका अपना नाम ही मतदाता सूची से गुम हो जाए? वोट ही वह औज़ार है, जिससे वह नीतियों पर सवाल पूछता है। उसके लिए यह मुद्दा रोटी-रोज़ी जितना ही बुनियादी है।
अब सवाल उठता है कि पत्र राष्ट्रपति को ही क्यों? जवाब संविधान में छिपा है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति करती हैं। अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें हटाने की प्रक्रिया वही है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है। यानी न धरना काफ़ी है, न नारे। हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना ज़रूरी है, जो राजनीतिक रूप से आसान नहीं माना जाता। इसी कारण किसान संगठनों का पत्र क़ानूनी से ज़्यादा नैतिक और राजनीतिक दबाव का दस्तावेज़ है। उसका संदेश यह है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से जनता निष्पक्ष होने के साथ-साथ निष्पक्ष दिखने की भी अपेक्षा रखती है।
किसानों की यह पहल अकेली नहीं है। पाँच अक्टूबर को पंद्रह से अधिक पूर्व नौकरशाहों और कार्यकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार को "आरोप-पत्र और महाभियोग नोटिस" सौंपकर पद छोड़ने को कहा। नौ अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के सांसद संसद से राष्ट्रपति भवन के लिए रवाना हुए, जहाँ उन्हें सोलह नेताओं के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंपना था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और रेलगाड़ियाँ रद्द हुईं। संयुक्त किसान मोर्चा ने भी हिरासतों और आवाजाही पर पाबंदियों की निंदा की। इन आरोपों पर प्रशासन का पक्ष जानना भी उतना ही ज़रूरी है।
दूसरा पक्ष भी सुनना होगा। आयोग और उसके समर्थक कहते आए हैं कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण संवैधानिक दायित्व है और इसका उद्देश्य फ़र्ज़ी या दोहरे नामों को हटाना है। उनका यह भी तर्क है कि अभी सारे आरोप राजनीतिक मंचों और मीडिया रिपोर्टों तक सीमित हैं। वे किसी अदालत या जाँच में सिद्ध नहीं हुए हैं। उनके अनुसार संवैधानिक पदाधिकारी को सड़क के दबाव में हटाने की परंपरा लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक नज़ीर बन सकती है। यह तर्क हल्का नहीं है। मगर इसका दूसरा पहलू भी उतना ही वज़नदार है। जिस संस्था पर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार की रक्षा का ज़िम्मा हो, उस पर उठे सवालों का जवाब चुप्पी से नहीं, तथ्यों और आँकड़ों से दिया जाना चाहिए।
असल में यह लड़ाई एक व्यक्ति की कुर्सी से बड़ी है। मसला उस भरोसे का है, जिस पर पूरी चुनावी व्यवस्था टिकी है। अगर आयोग को भरोसा बहाल करना है, तो उसे हटाए और जोड़े गए नामों का ब्योरा सार्वजनिक करना होगा। उसे चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर साफ़ स्पष्टीकरण भी देना होगा और स्वतंत्र जाँच से भागना नहीं होगा। इस्तीफ़ा होगा या नहीं, यह आने वाला वक़्त बताएगा। इतना तय है कि खेतों से उठी यह गूँज अब रायसीना की पहाड़ियों तक पहुँच चुकी है। लोकतंत्र में जब जनता सवाल पूछती है, तो जवाब देना ही पड़ता है।