भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः जब यूक्रेन की सरहदों पर धमाके गूंज रहे हों और पश्चिम एशिया की फ़िज़ा में बारूद की गंध घुली हो, तब कोई बड़ा नेता अगर कहे कि "हर सार्थक प्रयास में हमारा साथ रहेगा", तो इसे महज़ कूटनीतिक औपचारिकता समझ लेना भूल होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संदेश उस दौर में आया है जब दुनिया दो खेमों में बँटी दिखती है। हर देश से यही सवाल पूछा जा रहा है कि आप किधर हैं। भारत का जवाब सीधा है: हम शांति की तरफ़ हैं।
इस वाक्य को ग़ौर से पढ़िए। इसमें न किसी महाशक्ति का नाम है और न किसी पाले की घोषणा। फिर भी इसमें एक पूरी विदेश नीति छिपी है। नई दिल्ली बार-बार कहती रही है कि किसी युद्ध का हल रणभूमि में नहीं निकलता। बातचीत की मेज़ पर बैठे बिना कोई संघर्ष सचमुच नहीं थमता। जो देश कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई करता था, वही आज नए रूप में उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। फ़र्क़ बस इतना है कि अब उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा दूर तक सुनी जाती है।
सवाल उठता है कि इस बयान में "सार्थक" शब्द इतना अहम क्यों है। जवाब यह है कि शांति के नाम पर बहुत से शोर-शराबे वाले मंच सजते रहे हैं, जहाँ तस्वीरें खिंचती हैं, घोषणाएँ होती हैं और ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता। भारत इस भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय ऐसे प्रयासों के साथ खड़ा होना चाहता है जिनसे नतीजे निकलें। यानी ऐसी पहल जिसमें दोनों पक्षों की बात सुनी जाए, जो आम नागरिकों की जान की क़ीमत समझे और जो किसी पर शर्तें थोपने के बजाय रास्ता खोले। मोदी ने "सार्थक" कहकर बिना ऊँची आवाज़ के कसौटी तय कर दी है।
अब ज़रा इसकी वजह देखिए कि भारत को यह सब क्यों कहना पड़ रहा है। यूक्रेन की जंग ने खाद्यान्न, खाद और ऊर्जा की वैश्विक आपूर्ति को झकझोर दिया। पश्चिम एशिया में अशांति का सीधा असर भारत के तेल के बिल, समुद्री व्यापार और लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर पड़ता है। खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय हर साल जो रक़म घर भेजते हैं, उससे अनगिनत परिवारों का चूल्हा जलता है। इसलिए भारत के लिए शांति कोई दार्शनिक विलासिता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित की ज़रूरत है। जब पड़ोस में आग लगी हो, तो अपना घर सुरक्षित मान लेना समझदारी नहीं होती।
यहाँ भारत की एक अनोखी ताक़त काम आती है। मास्को हो या कीव, तेल अवीव हो या तेहरान और रियाद, भारत के संवाद के दरवाज़े लगभग सबके लिए खुले हैं। आज की ध्रुवीकृत दुनिया में यह कोई छोटी बात नहीं है। जिस देश से सभी पक्ष बात करने को तैयार हों, उसकी भूमिका स्वाभाविक रूप से अहम हो जाती है। यही वजह है कि बड़े-बड़े नेता भारत की ओर उम्मीद से देखते हैं। यह अलग बात है कि हर उम्मीद पूरी होना किसी के हाथ में नहीं होता।
फिर भी इस कहानी का दूसरा पहलू भी है, जिसे ईमानदारी से देखना ज़रूरी है। आलोचक पूछते हैं कि क्या शांति की अपील करना ही काफ़ी है, और क्या भारत को खुलकर किसी के पक्ष या विरोध में खड़ा नहीं होना चाहिए। यह बहस वाजिब है। लेकिन यह भी सच है कि हर संघर्ष में किसी एक खेमे का झंडा उठा लेना मध्यस्थ बनने की संभावना ही ख़त्म कर देता है। भारत ने अपने लिए वह रास्ता चुना है जिसमें वह सबसे बात कर सके, मानवीय मदद पहुँचा सके और ज़रूरत पड़ने पर पुल का काम कर सके। इस रणनीति की असली परीक्षा तब होगी जब शब्द कर्म में ढलेंगे।
यह भी याद रखना चाहिए कि भारत का रुख़ अचानक नहीं बदला है। संवाद और कूटनीति पर ज़ोर इस सरकार का लगातार दोहराया गया संदेश रहा है। चाहे ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनना हो, जी-20 जैसे मंचों पर अनाज और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे उठाना हो, या संकटग्रस्त इलाक़ों में राहत सामग्री भेजना, नई दिल्ली ने ख़ुद को ज़िम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश की है। ताज़ा बयान उसी सिलसिले की अगली कड़ी है।
असल में दुनिया इस वक़्त एक विचित्र विरोधाभास से गुज़र रही है। हथियार पहले से ज़्यादा हैं, तकनीक पहले से तेज़ है, पर भरोसा सबसे ज़्यादा घटा है। ऐसे में जो देश भरोसे की भाषा बोले, उसकी बात का वज़न अपने आप बढ़ जाता है। भारत के पास सैन्य ताक़त है, तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और नैतिक अपील की वह विरासत भी, जिसकी जड़ें बुद्ध और गांधी तक जाती हैं। इन तीनों का मेल उसे वह जगह देता है जो बहुत कम देशों को नसीब होती है।
अंततः सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वादा किसी ठोस पहल में बदलेगा। क्या भारत परदे के पीछे संवाद की ज़मीन तैयार करेगा, क्या वह पीड़ित आबादी के लिए राहत का दायरा बढ़ाएगा, और क्या वह वैश्विक संस्थाओं में शांति के पक्ष में अपनी आवाज़ और बुलंद करेगा। इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे। फ़िलहाल इतना तय है कि भारत ने अपनी भूमिका का एलान कर दिया है।
बारूद के इस शोर में एक शांत आवाज़ का सुनाई देना भी बड़ी बात है। अब देखना यह है कि दुनिया उस आवाज़ को कितनी गंभीरता से लेती है, और भारत उसे कितनी दूर तक ले जा पाता है।