भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः आज रावण जला, और साथ ही जल गई वह दीवार, जो भारत के सामान को न्यूज़ीलैंड के बाज़ार में महँगा बनाती थी।
विजयादशमी के दिन, 20 अक्टूबर 2026 से भारत-न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता औपचारिक रूप से लागू हो गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने खुद इस तारीख़ को शुभ बताकर चुना था। समझौते पर 27 अप्रैल को नई दिल्ली में हस्ताक्षर हुए थे। उसके बाद न्यूज़ीलैंड की संसद ने सितंबर में इससे जुड़ा क़ानून पारित किया और दोनों देशों ने अपनी आंतरिक प्रक्रियाएँ पूरी कीं। अब काग़ज़ पर लिखी बात ज़मीन पर उतर चुकी है।
इस समझौते की सबसे बड़ी बात यह है कि भारत से न्यूज़ीलैंड जाने वाले सभी उत्पादों, यानी सौ फ़ीसदी टैरिफ़ लाइनों, पर आयात शुल्क शून्य हो गया है। वस्त्र, चमड़ा, प्लास्टिक उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, दवाएँ, समुद्री उत्पाद और रसायन जैसे क्षेत्रों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। कुछ भारतीय उत्पादों पर पहले वहाँ दस फ़ीसदी तक शुल्क लगता था। हालाँकि न्यूज़ीलैंड का औसत आयात शुल्क पहले से कम है, फिर भी छोटे और मझोले उद्यमों के लिए, जिनका मुनाफ़ा पतला होता है, हर प्रतिशत मायने रखता है। लुधियाना की हौज़री इकाई हो, तिरुपुर का कपड़ा कारख़ाना हो या कानपुर की चमड़ा मंडी, सबके लिए यह प्रतिस्पर्धा में बराबरी का मौक़ा है। शर्त बस इतनी है कि माल पर 'उत्पत्ति के नियम' लागू होंगे, यानी उत्पाद वास्तव में भारत में बना होना चाहिए।
अब तक व्यापार समझौतों में वीज़ा का ज़िक्र बहुत कम होता था। इस बार तस्वीर अलग है। समझौते के तहत एक नई 'अस्थायी रोज़गार प्रवेश' श्रेणी बनी है। इसमें कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए पाँच हज़ार वीज़ा का कोटा तय है और वे तीन साल तक न्यूज़ीलैंड में रह सकते हैं। इसके अलावा हर साल एक हज़ार युवा भारतीयों को 'वर्किंग हॉलिडे' वीज़ा मिलेगा, जिसमें वे घूमने के साथ-साथ काम भी कर सकेंगे। विद्यार्थियों के लिए भी राहत है। विशेषकर STEM विषयों के स्नातकों के लिए पढ़ाई के बाद काम करने की सुविधा का प्रावधान किया गया है।
यह कोटा सुनने में भले छोटा लगे, पर इसका प्रतीकात्मक महत्व बड़ा है। सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार इस तरह की व्यवस्था भारत को पहली बार किसी देश के साथ मिली है। आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए यह नई उम्मीद है।
न्यूज़ीलैंड ने अगले पंद्रह वर्षों में भारत में बीस अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश को सुगम बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। ध्यान रहे कि यह 'सुगम बनाने' का वादा है, कोई सीधी गारंटी नहीं। असली परीक्षा यह होगी कि कृषि-तकनीक, डेयरी प्रसंस्करण, वानिकी और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पूँजी कितनी तेज़ी से उतरती है।
यह सवाल हर मुक्त व्यापार समझौता के साथ उठता है, और जायज़ भी है। इस बार भारत ने संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा है। दूध, क्रीम, दही, पनीर और छाछ जैसे डेयरी उत्पादों पर कोई शुल्क रियायत नहीं दी गई है। प्याज़, चीनी, मसाले, खाद्य तेल और रबर भी इसी सुरक्षित सूची में हैं। यानी भारतीय डेयरी किसान की सबसे बड़ी चिंता फ़िलहाल टल गई है।
लेकिन सेब, कीवी, मानुका शहद और एवोकाडो जैसे उत्पादों पर कोटे और न्यूनतम आयात मूल्य की शर्तों के साथ रियायतें मिलेंगी। सेब उत्पादक हिमाचल और कश्मीर के किसानों को सतर्क रहना होगा। सरकार का तर्क है कि न्यूनतम आयात मूल्य और कोटे की व्यवस्था उनकी रक्षा करेगी, पर इस दावे की असली जाँच आने वाले सीज़न में होगी। भारत अपने लगभग सत्तर फ़ीसदी टैरिफ़ मदों को उदार बनाएगा, जबकि न्यूज़ीलैंड के क़रीब 95 फ़ीसदी निर्यात पर शुल्क पूरी तरह हटेगा या घटेगा। इनमें ऊन, कोयला, लकड़ी और वाइन शामिल हैं। न्यूज़ीलैंड के कई उत्पादों पर लगभग आधे से ज़्यादा माल पहले दिन से शुल्क-मुक्त होगा।
अब ज़रा ज़मीन पर उतरें। वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार लगभग 1.1 अरब डॉलर का था। भारत के कुल विदेश व्यापार के सामने यह बहुत छोटी रक़म है। इसलिए इस समझौते को रातोंरात चमत्कार मान लेना ग़लत होगा। असल फ़ायदा तभी दिखेगा जब हमारे निर्यातक इस अवसर को पहचानकर वहाँ वितरण नेटवर्क बनाएँगे, गुणवत्ता मानकों का पालन करेंगे और लगातार आपूर्ति करेंगे। समझौता सिर्फ़ दरवाज़ा खोलता है, भीतर जाने का रास्ता कारोबारी को ख़ुद तय करना पड़ता है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं, और न्यूज़ीलैंड के साथ यह करार उसी कड़ी का नया पड़ाव है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ रही है और संरक्षणवाद की हवा तेज़ है। ऐसे में भरोसेमंद साझेदारों के साथ ठोस समझौते भारत के लिए बीमा का काम करते हैं।
सरकार को अब तीन काम प्राथमिकता से करने चाहिए। पहला, निर्यातकों तक जानकारी पहुँचाना, ताकि छोटे कारोबारी भी शुल्क-मुक्त सुविधा का उपयोग कर सकें। दूसरा, वीज़ा प्रक्रिया को पारदर्शी और दलालों से मुक्त रखना। तीसरा, किसानों के हितों पर नज़र रखना और ज़रूरत पड़ने पर तुरंत सुरक्षा उपाय अपनाना।
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। व्यापार की भाषा में कहें तो यह अवसर पर अड़चन की जीत का मौक़ा है। अब गेंद भारतीय उद्यमियों, पेशेवरों और नीति-निर्माताओं के पाले में है। दरवाज़ा खुल चुका है, देखना यह है कि कितने लोग उसमें क़दम रखने की हिम्मत और तैयारी दिखाते हैं।