भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः सावधान दिल्ली-एन सी आर! आपकी हर साँस अब सवाल पूछ रही है, और जवाब देने वाला कोई नहीं दिखता।
राजधानी की हवा एक बार फिर 'खराब' श्रेणी में पहुँच गई है, और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पूरे दिल्ली-एन सी आर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान का पहला चरण तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया है। सरकारी भाषा में यह "एहतियाती कदम" है, लेकिन आम आदमी के लिए यह एक चेतावनी की घंटी है, जिसे हर साल सुनकर भी हम अनसुना कर देते हैं।
वायु गुणवत्ता सूचकांक जब 201 से 300 के बीच पहुँचता है, तब हवा 'खराब' मानी जाती है, और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान का पहला चरण यहीं से सक्रिय होता है। मौसम विभाग और भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान के पूर्वानुमान के मुताबिक हवा की चाल धीमी रहने और अनुकूल मौसमी हालात न होने से प्रदूषक कण वातावरण में ही अटके रहने की आशंका है। यानी आने वाले दिनों में भी राहत की उम्मीद कम है। इसी आकलन के बाद आयोग की उप-समिति ने पूरे एन सी आर में पहले चरण की सभी कार्रवाइयाँ लागू करने का फ़ैसला किया।
पहले चरण में धूल पर नियंत्रण सबसे अहम है। निर्माण और तोड़फोड़ वाले स्थलों पर धूल रोकने के नियमों की सख़्ती से निगरानी होगी। सड़कों की सफ़ाई और पानी का छिड़काव बढ़ाया जाएगा, और जगह-जगह एंटी-स्मॉग गन चलाई जाएँगी। कचरे और निर्माण-मलबे को तय स्थानों तक नियमित रूप से पहुँचाने के निर्देश हैं। खुले में कचरा या पत्ते जलाने पर कार्रवाई होगी। वाहनों के प्रदूषण जाँच प्रमाणपत्र की पड़ताल होगी और बहुत पुराने वाहनों पर पहले से लागू पाबंदियों का पालन कराया जाएगा। सभी एजेंसियों को "कड़ी निगरानी" रखने को कहा गया है, और नागरिकों से सिटीज़न चार्टर का पालन करने की अपील की गई है।
हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। मौसम बदलता है, हवा बिगड़ती है, आदेश जारी होते हैं और कुछ दिन बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। सवाल यह है कि जब हमें पता है कि अक्टूबर से जनवरी के बीच दिल्ली की हवा ज़हरीली होती है, तो तैयारी गर्मियों में क्यों नहीं दिखती? ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान एक आपातकालीन व्यवस्था है, स्थायी इलाज नहीं। यह बुखार उतारने वाली गोली है, बीमारी की जड़ काटने वाली सर्जरी नहीं।
विशेषज्ञ बरसों से कहते आ रहे हैं कि दिल्ली का प्रदूषण किसी एक स्रोत की देन नहीं है। वाहनों का धुआँ, उद्योग, निर्माण की धूल, कचरा जलाना, आसपास के राज्यों में पराली और मौसम की मार, सब मिलकर इस संकट को गढ़ते हैं। ऐसे में केवल दिल्ली सरकार या केवल एक आयोग के भरोसे बैठना समझदारी नहीं है। पड़ोसी राज्यों की साझेदारी, ज़मीनी स्तर पर जवाबदेही और नियम तोड़ने वालों पर वास्तविक कार्रवाई के बिना कोई भी योजना कागज़ी शेर बनकर रह जाती है।
ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान की सबसे बड़ी चुनौती उसका क्रियान्वयन है। निर्माण स्थलों पर हरी जाली लगी है या नहीं, एंटी-स्मॉग गन सचमुच चल रही हैं या सिर्फ़ तस्वीरों में, कचरा जलाने वालों पर जुर्माना लगा या नहीं, यह सब तभी पता चलता है जब निरीक्षण ईमानदारी से हो। आयोग ने एजेंसियों को सतर्क रहने को कहा है, पर सतर्कता आदेश से नहीं, जवाबदेही से आती है। अगर अधिकारी हर लापरवाही का हिसाब देने को बाध्य हों, तभी ये उपाय असर दिखाएँगे।
इस पूरी बहस में हम खुद को पीड़ित मानकर बैठ जाते हैं, जबकि सच यह है कि हम भी समाधान का हिस्सा हो सकते हैं और समस्या का भी। अकेले गाड़ी से दफ़्तर जाना, छोटी दूरी के लिए भी वाहन निकालना, सर्दी में आग तापने के लिए कचरा जलाना और अपने वाहन की जाँच न कराना, ये छोटी आदतें मिलकर बड़ा धुआँ बनती हैं। कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन, मेट्रो का अधिक उपयोग और घर के आसपास धूल व कचरे पर नज़र रखना हमारे हाथ में है। सिटीज़न चार्टर कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारी साझा ज़िम्मेदारी की याद दिलाने वाला दस्तावेज़ है।
'खराब' श्रेणी की हवा भी लंबे समय तक सांस लेने पर नुकसान पहुँचाती है। बच्चों, बुज़ुर्गों, दमा और हृदय रोगियों के लिए यह और भी जोखिम भरी है। आँखों में जलन, गले में खराश, खाँसी और थकान जैसी शिकायतें बढ़ सकती हैं। सुबह-शाम की सैर करने वालों को भीड़भाड़ और धुंध के समय बाहर निकलने से बचना चाहिए, और ज़रूरत पड़ने पर मास्क का इस्तेमाल करना समझदारी है। लक्षण गंभीर हों तो डॉक्टर से सलाह लेने में देरी न करें।
अगर हालात और बिगड़े तो आयोग ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान के अगले, ज़्यादा सख़्त चरणों की ओर बढ़ सकता है, जिनमें निर्माण कार्य पर रोक और वाहनों पर पाबंदी जैसे कड़े फ़ैसले शामिल होते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम उस नौबत तक पहुँचने का इंतज़ार करेंगे? बेहतर होगा कि चेतावनी की इसी घंटी को अंतिम मानकर पूरे साल चलने वाली, पारदर्शी और जवाबदेह रणनीति बनाई जाए।
ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान-1 का लागू होना राहत की ख़बर नहीं, बल्कि जागने का संकेत है। राजधानी की हवा आज बीमार है, और उसका इलाज सिर्फ़ आदेशों से नहीं होगा। इसके लिए सरकार, एजेंसियों और नागरिकों, तीनों को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। वरना हर साल हम यही सुर्ख़ियाँ पढ़ते रहेंगे, और हर साल अपने बच्चों को धुंध में स्कूल भेजते रहेंगे।