भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने थल सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए करीब 2,12,000 करोड़ रुपये के पूंजीगत खरीद प्रस्तावों को "आवश्यकता की स्वीकृति" यानी एओएन दे दी। यह आंकड़ा जितना बड़ा है, उससे ज्यादा दिलचस्प वह सूची है जो इसके पीछे छिपी है। इसमें आसमान से बरसने वाले आत्मघाती ड्रोन हैं, दुश्मन के ड्रोन को मार गिराने वाली तकनीक है, चलती-फिरती तोपें हैं और जहाजों को मिसाइल हमलों से बचाने वाला कवच भी है। सवाल यह है कि भारत अचानक इतनी बड़ी तैयारी क्यों कर रहा है, और इसका आम नागरिक से क्या लेना-देना है?
पहले जवाब का सबसे जरूरी हिस्सा समझ लें। आधुनिक युद्ध अब केवल टैंकों और पैदल सैनिकों का खेल नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा है कि कुछ हजार रुपये के ड्रोन करोड़ों के टैंकों और रडारों को निशाना बना सकते हैं। इसी बदलती सच्चाई की झलक इस मंजूरी में साफ दिखती है। थल सेना के लिए जिन प्रणालियों को हरी झंडी मिली है, उनमें लंबी दूरी का कामिकाजे ड्रोन सिस्टम, सर्वे और स्ट्राइक को जोड़ने वाली एकीकृत निगरानी प्रणाली, लंबी दूरी का "ब्रिक" मानवरहित एरियल सिस्टम और निगरानी यूएवी शामिल हैं। यानी सेना की आंखें भी आसमान में होंगी और वार करने वाली भुजा भी।
अब बात उस हिस्से की, जिसे रक्षा विशेषज्ञ सबसे अहम मान रहे हैं, यानी हवाई सुरक्षा का घेरा। बेहद कम दूरी की हवाई रक्षा प्रणाली (वीशोराड्स) को मंजूरी मिली है, जो नई पीढ़ी के छोटे आकार के हवाई खतरों से निपटने के लिए बनाई जाती है। साथ ही प्लेटफॉर्म आधारित काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम भी है, जिसका मकसद आधुनिक रणभूमि में टैंकों की सुरक्षा बढ़ाना बताया गया है। सीधी भाषा में कहें तो अब दुश्मन का सस्ता ड्रोन भारतीय टैंक के पास फटकने से पहले ही निशाने पर होगा।
तोपखाने के मोर्चे पर भी सेना को बड़ी सौगात मिली है। स्वचालित ट्रैक्ड गन सिस्टम का अर्थ है ऐसी तोप, जो खुद चल सके और मशीनीकृत टुकड़ियों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सके। इसके साथ गन शॉट रिस्पॉन्स सिस्टम, हाई मोबिलिटी वाहन और हल्के बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टर भी सूची में हैं। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों तक रसद और साजो-सामान पहुंचाने में हाई मोबिलिटी वाहन अहम भूमिका निभाएंगे। इसे केवल हथियारों की खरीद मानना भूल होगी, क्योंकि यह सेना की गति और पहुंच बढ़ाने की योजना भी है।
नौसेना के लिए इस फैसले में एक ऐसी प्रणाली है, जिसका नाम भले तकनीकी हो, पर काम बेहद दिलचस्प है। "एक्टिव ऑफबोर्ड डिकॉय सिस्टम" यानी एओडीएस का उद्देश्य जहाजों की मिसाइल-रोधी सुरक्षा को ज्यादा भरोसेमंद बनाना है, खासकर आधुनिक जहाज-रोधी मिसाइलों के खिलाफ। आसान उदाहरण लें तो जैसे कोई जादूगर दर्शकों का ध्यान भटकाकर असली चीज बचा ले जाता है, वैसे ही यह प्रणाली दुश्मन की मिसाइल को भ्रमित कर असली युद्धपोत से दूर मोड़ने में मदद करती है। हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक हलचल के बीच यह कदम समुद्री सुरक्षा के लिए अहम माना जा रहा है। इसके अलावा कुछ अन्य महत्वपूर्ण नौसैनिक प्लेटफॉर्म को भी मंजूरी दी गई है।
वायुसेना को हेलीकॉप्टर, हवाई रक्षा प्रणालियां, हथियार और मोबाइल एक्स-बैंड डॉप्लर मौसम रडार प्रणालियां मिलने का रास्ता खुला है। मौसम रडार का जिक्र शायद आपको सामान्य लगे, पर सटीक मौसम जानकारी उड़ान सुरक्षा और अभियानों की योजना के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कोई घातक हथियार।
इस पूरे फैसले में सबसे बड़ी बात शायद आंकड़ों के बीच छिपी है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कुल खरीद का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा भारतीय उद्योग से लिया जाएगा। यानी यह पैसा सीमा पार नहीं जाएगा, बल्कि देश की फैक्ट्रियों, स्टार्टअप्स और छोटे-बड़े निर्माताओं तक पहुंचेगा। इसका सीधा मतलब है रोजगार, तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता को बल। जिस देश ने कभी हथियारों के लिए दूसरों का मुंह ताका हो, वह आज अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खुद बनाने की ओर बढ़ रहा है। यह बदलाव छोटा नहीं है।
फिर भी इस खबर को पढ़ते हुए एक जरूरी बात ध्यान रखनी होगी। एओएन खरीद प्रक्रिया का शुरुआती चरण है, यानी जरूरत को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करना। इसके बाद प्रस्तावों को तय प्रक्रियाओं से गुजरना होगा, जिनमें निविदाएं, परीक्षण, अनुबंध और फिर सेना में शामिल किया जाना आता है। अनुभव बताता है कि मंजूरी और तैनाती के बीच वर्षों का फासला हो सकता है। इसलिए असली कसौटी यह होगी कि ये प्रणालियां कागज से निकलकर कितनी जल्दी सीमा पर पहुंचती हैं। देरी हुई तो आज की आधुनिक तकनीक कल पुरानी पड़ सकती है।
यहीं पर उद्योग, सरकार और सेना, तीनों की परीक्षा है। उद्योग को समय पर गुणवत्ता वाली आपूर्ति देनी होगी, सरकार को प्रक्रिया की सुस्ती घटानी होगी, और सेना को स्पष्ट जरूरतें समय पर बतानी होंगी। जिस रफ्तार से ड्रोन तकनीक बदल रही है, उसमें महीनों की देरी भी भारी पड़ सकती है।
आखिर में यही कहा जा सकता है कि 2.12 लाख करोड़ रुपये की यह मंजूरी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते युद्ध के स्वरूप को लेकर भारत की सोच का संकेत है। आसमान में ड्रोन, जमीन पर गतिशील तोपें और समंदर में मिसाइल-रोधी कवच, यह तिकड़ी भविष्य की लड़ाई की तैयारी बताती है। अब देश की नजर इस पर रहेगी कि वादे कितनी तेजी से हकीकत बनते हैं। क्योंकि सुरक्षा की दुनिया में घोषणा से ज्यादा मायने इस बात के हैं कि हथियार समय पर जवान के हाथ में पहुंचे।