भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः शुक्रवार की सुबह बनासकांठा की सड़कों पर कुछ अलग ही नज़ारा था। जिस ज़िले को लोग अब तक रेतीली ज़मीन, कम बारिश और पानी की किल्लत के लिए जानते थे, वहाँ हज़ारों लोग हाथ हिलाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो का स्वागत कर रहे थे। दो दिन की गुजरात यात्रा की शुरुआत उन्होंने इसी उत्तर गुजरात की धरती से की। इस दौरान उन्होंने लगभग ₹14,000 करोड़ की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास, लोकार्पण और राष्ट्र को समर्पण किया। सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम आख़िर किन कामों पर लगेगी, और इसका आम आदमी की ज़िंदगी से क्या लेना-देना है?
पहली नज़र में ₹14,000 करोड़ बस एक भारी-भरकम संख्या लगती है। पर इस दौरे की सबसे चर्चित बात कोई सड़क या पुल नहीं, बल्कि पशुपालन से जुड़ा एक केंद्र है। भीलडी में प्रधानमंत्री ने भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर का उद्घाटन किया। रिपोर्टों के मुताबिक यह केंद्र कांकरेज नस्ल की गायों के संरक्षण और उनकी नस्ल सुधार से जुड़ा है। यह वही नस्ल है जो इस इलाके की पहचान रही है और जिसे दूध तथा मज़बूत बैल, दोनों के लिए जाना जाता है।
इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता। बनासकांठा गुजरात के सबसे बड़े दूध उत्पादक ज़िलों में गिना जाता है। यहाँ की डेयरी सहकारिता ने हज़ारों परिवारों को आर्थिक सहारा दिया है, और इन परिवारों में बड़ी संख्या में महिलाएँ हैं। जब सरकार देसी नस्लों के शोध और प्रजनन पर पैसा लगाती है, तो उसका सीधा असर गाँव के उस पशुपालक की कमाई पर पड़ता है जो रोज़ सुबह दूध लेकर सहकारी समिति तक जाता है।
इस पैकेज की सूची सिर्फ़ पशुपालन तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्टों में कृषि और बुनियादी ढाँचे की पहलों का ज़िक्र है, जिनमें मेट्रो विस्तार और राजमार्गों के उन्नयन जैसी योजनाएँ भी शामिल बताई गई हैं। कुछ रिपोर्टों में पूरे गुजरात दौरे की कुल घोषणाओं को ₹14,400 करोड़ से ऊपर बताया गया है, क्योंकि दूसरे दिन एकता नगर में भी लगभग ₹400 करोड़ की परियोजनाएँ जुड़ती हैं। इसलिए जब कोई कहे कि आँकड़ा "ज़रा अलग" है, तो उलझने की ज़रूरत नहीं। बनासकांठा के लिए ₹14,000 करोड़ से अधिक का आँकड़ा है, और दोनों दिनों का जोड़ इससे थोड़ा ऊपर बैठता है।
एक और ख़बर ने सुर्खियाँ बटोरीं। बताया गया कि इसी मौके पर किसान सम्मान निधि की नई किस्त के रूप में देशभर के किसानों के खातों में करीब ₹19,000 करोड़ की राशि भी जारी की गई। यानी एक मंच से स्थानीय परियोजनाओं की सौगात भी मिली और देश के करोड़ों किसानों तक सीधी मदद भी पहुँची। राजनीति और अर्थनीति का ऐसा मेल कम ही देखने को मिलता है।
उत्तर गुजरात की असली चुनौती हमेशा पानी रही है। जब तक सिंचाई की पक्की व्यवस्था नहीं होती, तब तक कोई भी योजना ज़मीन पर टिकाऊ नतीजे नहीं दे सकती। पिछले वर्षों में इस इलाके में ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा मिला है, जिससे कम पानी में भी किसान बेहतर पैदावार ले पा रहे हैं। अब नई परियोजनाओं से उम्मीद की जा रही है कि यह सिलसिला और आगे बढ़ेगा। पानी, पशुधन और उपज, ये तीनों जब एक साथ मज़बूत होते हैं, तभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असली जान आती है।
हर बड़े ऐलान के साथ कुछ वाजिब सवाल भी उठते हैं, और लोकतंत्र में उन्हें उठना भी चाहिए। शिलान्यास और उद्घाटन की संख्या जितनी बड़ी होती है, समय पर पूरा होने की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। कितनी परियोजनाएँ तय समयसीमा में पूरी होंगी, पैसा कहाँ-कहाँ और कैसे ख़र्च होगा, और स्थानीय लोगों को रोज़गार कितना मिलेगा, इन सबका जवाब आने वाले महीनों में दिखेगा। समर्थक इसे विकास की रफ़्तार कहते हैं, तो विरोधी इसे चुनावी माहौल से जोड़कर देखते हैं। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है, और उसकी कसौटी सिर्फ़ एक है: ज़मीन पर काम कितना दिखता है।
यह दौरा सिर्फ़ विकास तक सीमित नहीं है। 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाएगा, जो उनकी 151वीं जयंती है। प्रधानमंत्री एकता नगर में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे और वहाँ भी ₹400 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं का शुभारंभ करेंगे। इनमें सीवेज और जल शोधन संयंत्र, नर्मदा घाट का उन्नयन, पर्यटन सुविधाएँ और एक आईआरसीटीसी होटल शामिल बताए गए हैं। इस तरह एक ही यात्रा में किसान, पशुपालक, पर्यटन और राष्ट्रीय भावना, चारों को साधने की कोशिश दिखाई देती है।
बनासकांठा ने इस दिन को बड़े उत्साह से देखा। रोड शो की भीड़, मंच की भव्यता और घोषणाओं की चमक अपनी जगह है, लेकिन किसी भी इलाके की तक़दीर तस्वीरों से नहीं, नतीजों से बदलती है। अगर भीलडी का शोध केंद्र वाकई कांकरेज नस्ल को मज़बूत करता है, अगर सिंचाई की सुविधाएँ आख़िरी खेत तक पहुँचती हैं और अगर सड़कें व परिवहन ग्रामीण बाज़ार को शहर से जोड़ते हैं, तो ये ₹14,000 करोड़ सचमुच इतिहास में दर्ज होंगे।
फ़िलहाल इतना तय है कि यह दिन बनासकांठा के लिए केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था। यह उस उम्मीद का दिन था जो रेत में भी हरियाली देखने का हौसला रखती है। अब इंतज़ार इस बात का है कि यह उम्मीद फ़ाइलों से निकलकर खेतों, गौशालाओं और गाँव की सड़कों तक कब पहुँचती है।