भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः कल्पना कीजिए कि जिस दवा के दस गोलियों के पत्ते के लिए आप लगभग सात सौ रुपये देते आए हैं, वह अचानक तिहत्तर रुपये में मिलने लगे। सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन यह कोई विज्ञापन नहीं, सरकारी आदेश की सच्चाई है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर की 543 दवा ब्रांडों और पैक के अधिकतम खुदरा मूल्य घटाए हैं। कुछ मामलों में यह कटौती 90 प्रतिशत से भी ऊपर, यानी करीब 93 प्रतिशत तक है। नई दरें 9 नवंबर से लागू होंगी। फिर भी सवाल वही पुराना है: क्या यह राहत सचमुच मरीज की जेब तक पहुंचेगी?
पहले उन आंकड़ों को देखिए जो उम्मीद जगाते हैं। स्तन कैंसर के इलाज में काम आने वाली अनास्त्रोजोल की गोलियों का पत्ता, जो पहले करीब 696 रुपये का था, अब 73 रुपये का रह जाएगा। अज़ासिटिडीन का इंजेक्शन 6,337 रुपये से घटकर लगभग 1,495 रुपये पर आ गया है। जो परिवार महीनों से इलाज के खर्च के बोझ तले दबे हैं, उनके लिए ये संख्याएं मामूली नहीं हैं। अस्पताल के बाहर कतार में खड़ा आदमी ऐसी खबर पर भरोसा करना भी चाहता है और डरता भी है कि कहीं यह एक और खोखली घोषणा न निकले।
इस कटौती के पीछे सरकार का "व्यापार मार्जिन युक्तिकरण" नाम का कदम है। 17 अक्टूबर की अधिसूचना के तहत 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (जीएसटी छोड़कर) के 30 प्रतिशत पर सीमित कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि थोक विक्रेता को मिलने वाली कीमत पर अधिकतम लगभग 42.86 प्रतिशत मुनाफा जोड़ा जा सकता है। सूची में इम्यूनोथेरेपी की वे दवाएं भी हैं जो बीस से ज्यादा तरह के कैंसर में इस्तेमाल होती हैं। इनके अलावा डेनोसुमैब, पेगफिलग्रास्टिम और बेवासिज़ुमैब जैसी महंगी दवाएं भी शामिल हैं। यह कोई पहला प्रयोग नहीं है। 2019 में 42 कैंसर दवाओं पर ऐसी ही सीमा लगाई गई थी, जिससे 526 ब्रांडों के दाम 90 प्रतिशत तक गिरे थे और सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत का अनुमान बताया गया था।
अब कहानी का दूसरा पहलू, जिसे सुर्खियों की चमक अक्सर ढक लेती है। इस पूरी कवायद में एक बड़ा सा "लेकिन" छिपा है। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ सबसे महंगी और सबसे ज्यादा बिकने वाली दवाओं के दाम जस के तस हैं। इम्यूनोथेरेपी की मशहूर दवा कीट्रूडा आज भी करीब 2.16 लाख रुपये पर टिकी है। बेवासिज़ुमैब की ऊंची बिक्री वाली कुछ पैकिंग के दाम भी नहीं बदले। यानी सुर्खी में जो “90 प्रतिशत” दिखता है, वह हर दवा और हर मरीज पर लागू नहीं होता। उसके पीछे असल तस्वीर कहीं ज्यादा धुंधली है।
विशेषज्ञों की चिंता यहीं से शुरू होती है। अखिल भारतीय औषधि कार्रवाई नेटवर्क (एआईडीएएन) की मालिनी ऐसोला का कहना है कि इस प्रक्रिया का मकसद शुरू से कैंसर के इलाज को किफायती बनाना था ही नहीं। उनके अनुसार निर्माताओं के "मरीज सहायता कार्यक्रमों" (पीएपी) के तहत मुफ्त दी जाने वाली मात्रा को गणना से बाहर रखने के कारण पेटेंट वाली अत्यधिक महंगी दवाओं में सार्थक कमी की गुंजाइश कमजोर पड़ गई। उनका तर्क है कि ये कार्यक्रम दरअसल बाजार बढ़ाने की रणनीति हैं, और उनके बाहर रहने से व्यापारिक मार्जिन कागज पर कम दिखता है और कीमतों की कटौती भी पतली पड़ जाती है।
दिल्ली की मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. तान्वी सिंह की राय भी इसी दिशा में जाती है। उनके मुताबिक जो मरीज पहले से सहायता कार्यक्रमों में शामिल हैं, उन्हें दवा वैसे भी मुफ्त या भारी छूट पर मिल रही है, इसलिए उनके खर्च पर इस सीमा का खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। बाजार शोध संस्था फार्मारैक के हवाले से यह भी सामने आया है कि सितंबर 2026 तक सबसे ज्यादा बिकने वाली कैंसर दवाओं में से सिर्फ तीन, यानी बेवासिज़ुमैब, निवोलुमैब और एबिराटेरोन एसीटेट, इस नए आदेश के दायरे में आती हैं।
एक और पेच है, जो आम पाठक की नजर से अक्सर छूट जाता है। यह कदम केवल व्यापारिक मार्जिन पर लगाम लगाता है, दवा की बुनियादी कीमत तय करने की व्यवस्था को नहीं छूता। औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत गैर-अनुसूचित दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य हर साल दस प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इसका सीधा मतलब है कि आज मिली राहत कल धीरे-धीरे खिसक भी सकती है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट की तीखी निगाह का भी सामना करना पड़ा है, जिसने कैंसर दवाओं की ऊंची कीमतों और आपूर्ति शृंखला में वसूले जा रहे मुनाफे पर सवाल उठाए थे। इस पृष्ठभूमि में यह कटौती एक जरूरी कदम तो है, पर अंतिम समाधान नहीं।
आखिर समस्या की जड़ कहां है? जड़ में है पारदर्शिता की कमी, पेटेंट वाली दवाओं की ऊंची कीमत और दवा के निर्माण लागत व बाजार भाव के बीच का बेहिसाब फासला। जब तक कंपनियों की असली लागत, वितरकों का हिस्सा और अस्पताल फार्मेसी के मार्जिन खुले तौर पर सामने नहीं आते, तब तक हर बार एक नई अधिसूचना जारी करके बाजार को सुधारने की कोशिश आधी-अधूरी ही रहेगी। एक बार दाम घटाकर वाहवाही लूटना आसान है, लेकिन बार-बार सुधार लाने वाली स्थायी व्यवस्था बनाना कठिन और कहीं ज्यादा जरूरी है।
मरीजों और उनके परिजनों के लिए फिलहाल सलाह सीधी है। 9 नवंबर के बाद दवा खरीदते समय एनपीपीए की वेबसाइट या "फार्मा सही दाम" ऐप पर संशोधित कीमतें जरूर जांचिए, और दुकानदार से नया बिल मांगिए। निर्माता अपनी संशोधित कीमतें जमा कर रहे हैं, इसलिए सूची आगे भी अपडेट होती रहेगी।
कुल मिलाकर यह फैसला स्वागत योग्य है, पर इसे अंतिम जीत मानना जल्दबाजी होगी। जिस देश में कैंसर का इलाज कई परिवारों को कर्ज और बेबसी के रास्ते पर धकेल देता है, वहां सिर्फ एक बार की कटौती से संतोष कर लेना खुद को बहलाने जैसा है। असली परीक्षा तब होगी जब सबसे महंगी दवाओं के दाम भी नीचे आएंगे, सहायता कार्यक्रमों की पारदर्शी निगरानी होगी और सालाना बढ़ोतरी पर भी अंकुश लगेगा। तब तक यही कहा जा सकता है कि सरकार ने दरवाजा खोला जरूर है, मगर रास्ता अभी बहुत लंबा है।