भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः सुबह आँख खुलते ही अलार्म बंद करने से लेकर रात को सोने से पहले फ़िल्म चुनने तक, आज हमारे दिन का हर छोटा-बड़ा फ़ैसला किसी न किसी एल्गोरिदम की सलाह से होकर गुज़रता है। रास्ता गूगल बताता है, खाना ऐप सुझाता है, ख़बरें फ़ीड तय करती है और अब ईमेल, रिपोर्ट और कविता तक चैटबॉट लिख देता है। सुविधा के इस उत्सव में एक असहज सवाल दब गया है। यदि यह निर्भरता इसी रफ़्तार से बढ़ती रही, तो क्या हम ऐसी महामारी की ओर बढ़ रहे हैं जो किसी वायरस से नहीं, बल्कि कोड, डेटा और हमारी अपनी आलस्यभरी आदतों से फैलेगी?
महामारी की पहचान यह है कि वह तेज़ी से फैलती है, बड़े पैमाने पर असर डालती है और व्यवस्थाओं को पंगु कर देती है। डिजिटल दुनिया में ऐसे ख़तरे दस्तक दे चुके हैं। वर्ष 2017 में "वानाक्राई" रैनसमवेयर ने कुछ ही दिनों में डेढ़ सौ से अधिक देशों के दो लाख से ज़्यादा कंप्यूटर जकड़ लिए थे, जिनमें अस्पतालों के तंत्र भी शामिल थे। तब हमलावर इंसान थे और औज़ार सीमित। आज वही हमलावर ए आई की मदद से मिनटों में हज़ारों निजी ढंग के फ़िशिंग संदेश, नक़ली आवाज़ें और फ़र्ज़ी वीडियो तैयार कर सकते हैं। ख़तरा अब केवल हैकिंग का नहीं, भरोसे के टूटने का है।
पहला जोखिम सोचने की क्षमता के कमज़ोर होने का है। जैसे व्यायाम के बिना शरीर शिथिल होता है, वैसे ही अभ्यास के बिना दिमाग़ भी। कैलकुलेटर ने मानसिक गणना घटाई और जीपीएस ने दिशा-बोध कमज़ोर किया। अब जब लेखन, विश्लेषण और निर्णय भी मशीन को सौंपे जा रहे हैं, तो आलोचनात्मक सोच पर असर स्वाभाविक है। यदि विद्यार्थी हर असाइनमेंट ए आई से लिखवाएँगे, तो उन्हें उत्तर मिल जाएगा, पर उत्तर तक पहुँचने की प्रक्रिया वे नहीं सीख पाएँगे। यह मौन संकट है, जिसके लक्षण वर्षों बाद दिखेंगे, जब पूरी पीढ़ी के पास जानकारी तो होगी, पर विवेक की कमी।
दूसरा जोखिम झूठ के औद्योगीकरण का है। ए आई से बनी सामग्री इतनी विश्वसनीय दिखती है कि सच और झूठ का अंतर धुँधला पड़ने लगा है। डीपफ़ेक वीडियो किसी नेता के मुँह से कुछ भी कहलवा सकता है, और क्लोन की गई आवाज़ में किसी बुज़ुर्ग के पास "बेटे" का फ़ोन आ सकता है कि तुरंत पैसे भेज दो। भारत जैसे देश में, जहाँ डिजिटल साक्षरता असमान है और व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड पर सहज भरोसा कर लिया जाता है, यह जोखिम और गहरा है। जब झूठ मुफ़्त, तेज़ और असीमित हो, तो समाज का साझा सच बिखरने लगता है। संक्रमण यहीं सबसे तेज़ फैलता है।
तीसरा जोखिम किसी एक बिंदु पर विफलता का है। जब बैंकिंग, स्वास्थ्य, परिवहन और बिजली-वितरण जैसी सेवाएँ गिने-चुने ए आई तंत्रों पर टिक जाती हैं, तो एक ग़लती या एक सफल हमला पूरी शृंखला को गिरा सकता है। मान लीजिए किसी अस्पताल का निदान-तंत्र ग़लत डेटा पर प्रशिक्षित हो, या शहर की यातायात प्रणाली को कोई बाहरी शक्ति गुमराह कर दे। जुड़ी हुई प्रणालियों की कार्यकुशलता ही उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बन सकती है।
चौथा जोखिम निजता की क़ीमत पर मिलने वाली सुविधा है। हर ए आई सेवा हमारे डेटा से पलती है, यानी हमारी बातचीत, पसंद, स्वास्थ्य संबंधी प्रश्नों और भावनाओं से। हम अनजाने में अपनी निजी जानकारी ऐसे मंचों पर साझा कर देते हैं जिनकी नीतियाँ हमने कभी पढ़ी ही नहीं होतीं। यदि यह डेटा लीक हो, बिक जाए या दुरुपयोग हो, तो उसकी भरपाई संभव नहीं। पासवर्ड बदला जा सकता है, पर आपकी आदतों का पूरा नक़्शा नहीं।
फिर भी ए आई अपने आप में शत्रु नहीं है। वह कैंसर की शुरुआती पहचान में मदद कर रहा है, किसानों को मौसम का पूर्वानुमान दे रहा है और भाषाई बाधाएँ तोड़ रहा है। समस्या तकनीक में नहीं, उस अंधी निर्भरता में है जिसमें हम सवाल पूछना ही छोड़ देते हैं। कोई भी तकनीक तब ख़तरनाक बनती है, जब उस पर निगरानी, जवाबदेही और विकल्प की व्यवस्था न हो।
अब प्रश्न है कि समय रहते कौन-से एहतियाती कदम उठाए जाएँ। सबसे पहले डिजिटल साक्षरता को राष्ट्रीय अभियान बनाना होगा। स्कूलों से पंचायतों तक लोगों को फ़र्ज़ी संदेश, डीपफ़ेक और ठगी पहचानना सिखाया जाए; संदिग्ध सूचना आगे बढ़ाने से पहले जाँचने की आदत ही पहला टीका है। दूसरे, स्वास्थ्य, न्याय, वित्त और सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अंतिम निर्णय हमेशा किसी जवाबदेह इंसान के हाथ में रहे। ए आई सलाहकार हो सकता है, न्यायाधीश नहीं। तीसरे, ए आई से बनी सामग्री पर स्पष्ट लेबल, कड़े डेटा-संरक्षण नियम और दुरुपयोग पर दंड तय हो, तथा कंपनियाँ अपने मॉडलों की सीमाएँ सार्वजनिक करें। चौथे, महत्त्वपूर्ण सेवाओं में मैन्युअल विकल्प बने रहें, ताकि तंत्र ठप होने पर समाज न रुके। पाँचवें, हम निजी जानकारी साझा करने में संयम बरतें, ज़रूरी उत्तरों की स्वतंत्र पुष्टि करें और रोज़ कुछ काम जानबूझकर अपने दिमाग़ से करें। अंत में, सरकारें साइबर सुरक्षा में निवेश करें और देशों के बीच सहयोग बढ़ाएँ, क्योंकि साइबर ख़तरे सीमाएँ नहीं पहचानते।
इतिहास गवाह है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति वरदान और चुनौती, दोनों लाई है; फ़र्क़ इससे पड़ा कि समाज ने उसे कितनी समझदारी से अपनाया। यदि हमने सोचना, परखना और सवाल करना छोड़ दिया, तो कोई बाहरी वायरस हमें नहीं हराएगा; हम अपनी ही सुविधा के शिकार होंगे।
महामारियाँ तब फैलती हैं जब चेतावनियाँ नज़रअंदाज़ की जाती हैं। चेतावनी आज हमारे सामने है और समय अब भी हमारे हाथ में। सवाल यह है कि क्या हम मशीन को अपने लिए काम करने देंगे, या अपनी सोच उसके हवाले कर देंगे? उत्तर हमारे आज के फ़ैसलों में छिपा है।