भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः दिल्ली में दिवाली की खुशियों पर एक बार फिर जहरीली हवा का साया मंडराने लगा है। सर्दियों की दस्तक के साथ राष्ट्रीय राजधानी की वायु गुणवत्ता तेजी से बिगड़ रही है। आसमान में छाई धुंध, सांस लेने में बढ़ती परेशानी और प्रदूषण के लगातार बढ़ते आंकड़े इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि दिल्लीवासियों के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होने वाले। चिंता की बात यह है कि अभी दिवाली का त्योहार भी नहीं आया है और राजधानी की हवा पहले ही स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब दिवाली से पहले ही हालात इतने खराब हैं, तो त्योहार के दौरान पटाखों का धुआं दिल्ली की स्थिति को किस स्तर तक पहुंचा सकता है?
4 नवंबर 2026 की सुबह सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 377 तक पहुंच गया, जो 'बेहद खराब' श्रेणी में आता है। यह स्थिति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है। हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण, विशेषकर PM2.5, सांस के माध्यम से फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोगों तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
दिल्ली में प्रदूषण का बढ़ना कोई नई समस्या नहीं है। हर वर्ष अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत में मौसम में बदलाव के साथ राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के क्षेत्रों की हवा बिगड़ने लगती है। इस बार भी गिरता तापमान, धीमी हवाएं और वातावरण में नमी प्रदूषक कणों को जमीन के नजदीक रोकने में भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक इकाइयों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और पंजाब तथा हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं भी प्रदूषण बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं। पिछले दिनों हुई बारिश और तेज हवाओं से दिल्ली की हवा को कुछ राहत मिली थी, लेकिन मौसम सामान्य होते ही प्रदूषण ने दोबारा अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। इससे स्पष्ट है कि दिल्ली की वायु गुणवत्ता केवल एक कारण से प्रभावित नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई परस्पर जुड़े कारण हैं।
प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के दूसरे चरण यानी ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान -2 को लागू कर दिया है। इसके तहत सड़कों की नियमित मशीनों से सफाई, पानी का छिड़काव, एंटी-स्मॉग गन का इस्तेमाल और धूल नियंत्रण के उपाय तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। निजी वाहनों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग शुल्क बढ़ाने तथा होटल और रेस्तरां में कोयले और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक जैसे कदम भी शामिल हैं। डीजल जनरेटर के संचालन पर भी सख्ती की गई है। इन उपायों का उद्देश्य प्रदूषण के स्तर को और अधिक गंभीर होने से रोकना है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक आदेशों और अस्थायी प्रतिबंधों से उस समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है, जो वर्षों से दिल्ली और पूरे एनसीआर को प्रभावित कर रही है?
दिवाली के मद्देनजर पटाखों को लेकर भी इस बार विशेष प्रतिबंध और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में निर्धारित शर्तों के साथ केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल की सीमित अवधि के लिए अनुमति दी है। अदालत के निर्देशानुसार 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तथा रात 8 से 10 बजे तक ही ग्रीन पटाखे जलाए जा सकेंगे। अस्पतालों, नर्सिंग होम, शिक्षण संस्थानों, वृद्धाश्रमों और निर्धारित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने पर प्रतिबंध रहेगा। केवल सी एस आई आर-एन ई ई आर आई से अनुमोदित और पीसो से प्रमाणित पटाखों को ही अनुमति दी गई है। इन पर क्यू आर कोड होना भी आवश्यक है, जिससे उनकी प्रमाणिकता और निर्माता की जानकारी की जांच की जा सके। 9 नवंबर से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध फिर लागू हो जाएगा।
यह व्यवस्था निश्चित रूप से प्रदूषण कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह प्रभावी निगरानी और सख्त क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि प्रतिबंधों के बावजूद बाजार में पारंपरिक पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को पूरी तरह रोकना आसान नहीं रहा है। कई बार सामान्य पटाखों को ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों, स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित नियमों का उल्लंघन न हो। अवैध बिक्री करने वालों और प्रतिबंधित पटाखे चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी है।
हालांकि, दिल्ली के प्रदूषण के लिए केवल दिवाली के पटाखों को जिम्मेदार ठहराना समस्या की वास्तविक तस्वीर से मुंह मोड़ने जैसा होगा। पटाखों से निकलने वाला धुआं पहले से प्रदूषित वातावरण में प्रदूषक कणों और हानिकारक गैसों की मात्रा बढ़ा सकता है, लेकिन वाहनों का उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण, सड़क की धूल और पराली जलाने जैसी समस्याएं पूरे सर्दियों के मौसम में हवा को प्रभावित करती हैं। इसलिए दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान की सरकारों को भी साझा रणनीति के तहत काम करना होगा। पराली के वैज्ञानिक प्रबंधन, किसानों को आर्थिक सहायता, स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल और प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण के बिना इस संकट से स्थायी राहत मिलना मुश्किल है।
दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करना, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण सुनिश्चित करना और हरित क्षेत्रों का विस्तार करना भी दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा होना चाहिए। इसके साथ ही नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। अनावश्यक निजी वाहन इस्तेमाल से बचना, कचरा और पत्तियां खुले में नहीं जलाना तथा दिवाली पर पटाखों के बजाय दीपों और पारंपरिक रोशनी से त्योहार मनाना समाज के स्तर पर सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
दिवाली रोशनी, खुशियों और आपसी सद्भाव का त्योहार है, न कि ऐसी प्रतिस्पर्धा का अवसर जिसमें आसमान को धुएं से भर दिया जाए। त्योहार की असली खुशी तभी है जब हर व्यक्ति बिना किसी डर के खुलकर सांस ले सके। सरकारों को यह समझना होगा कि प्रदूषण नियंत्रण केवल सर्दियों में लागू होने वाला मौसमी अभियान नहीं, बल्कि सालभर चलने वाली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि दिल्ली को हर साल नवंबर में स्मॉग, स्वास्थ्य संकट और प्रतिबंधों के उसी चक्र से गुजरना पड़ रहा है, तो यह हमारी नीतियों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करने का समय है। अब जरूरत तात्कालिक घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस, समन्वित और जवाबदेह कार्रवाई की है। आखिरकार, त्योहार कुछ दिनों के लिए आते हैं, लेकिन स्वच्छ हवा हर दिन हर नागरिक का अधिकार है।