भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी, न कि पुलिस द्वारा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से। इस फैसले से पुलिस और जांच एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ेगी तथा गिरफ्तारी की कागजी कार्रवाई में देरी करके किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने की संभावना पर रोक लगेगी।
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच अंतर करके संविधान में दिए गए संरक्षण को कमजोर नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि में अदालत तक पहुंचने के लिए आवश्यक यात्रा समय शामिल नहीं होता। हालांकि, पूछताछ, तलाशी, जब्ती या जांच के नाम पर हिरासत में बिताए गए समय को इस गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता।
यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में आया, जिसमें चार आरोपियों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मामला एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज किया गया था और आरोपियों पर 11.03 किलोग्राम याबा टैबलेट की कथित बरामदगी से संबंधित आरोप थे।
मामले के अनुसार, चारों आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब दो बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था। हालांकि, उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दर्ज की गई। इसके बाद उन्हें उसी दिन शाम 4 बजकर 45 मिनट पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जांच एजेंसी का तर्क था कि 24 घंटे की अवधि औपचारिक गिरफ्तारी के समय से शुरू होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि आरोपियों की स्वतंत्रता 29 सितंबर को दोपहर दो बजे ही प्रतिबंधित हो गई थी। इसलिए 24 घंटे की गणना भी उसी समय से होनी चाहिए थी। उन्हें 30 सितंबर को दोपहर दो बजे तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन मानते हुए आरोपियों की तत्काल रिहाई के आदेश दिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपने नियंत्रण में रखती है और उसे अपनी इच्छा से वहां से जाने की स्वतंत्रता नहीं होती, तो इसे वास्तविक हिरासत माना जाएगा। ऐसी स्थिति में संवैधानिक सुरक्षा तुरंत लागू हो जाती है। पुलिस किसी व्यक्ति को पूछताछ या जांच के नाम पर हिरासत में रखकर यह दावा नहीं कर सकती कि औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज नहीं होने के कारण 24 घंटे की अवधि शुरू नहीं हुई। अदालत के अनुसार, ऐसी व्याख्या से जांच एजेंसियों को मनमाने ढंग से हिरासत बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
फैसले में मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी पर भी विशेष जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को पेश किए जाने पर मजिस्ट्रेट केवल पुलिस के गिरफ्तारी मेमो में दर्ज समय पर निर्भर न रहें। उन्हें स्वतंत्र रूप से यह पता लगाना होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में कब प्रतिबंधित की गई थी। हिरासत की वास्तविक तारीख और समय रिकॉर्ड में दर्ज करना तथा संवैधानिक समय-सीमा का पालन सुनिश्चित करना न्यायिक अधिकारी की जिम्मेदारी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 24 घंटे के भीतर पेशी होना ही पर्याप्त नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 58 के तहत किसी व्यक्ति को बिना अनावश्यक देरी के मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है। हिरासत की अवधि उचित होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से कम समय तक भी अनुचित रूप से हिरासत में रखा गया है, तो मजिस्ट्रेट परिस्थितियों के आधार पर पुलिस रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों पर भी विचार किया। अदालत ने ओडिशा हाईकोर्ट के आर्यमान पटनायक, मद्रास हाईकोर्ट के कन्नन और केरल हाईकोर्ट के अरुण के. थॉमस मामलों में अपनाए गए उस दृष्टिकोण को सही कानून नहीं माना, जिसमें औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत को 24 घंटे की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी। वहीं, केरल हाईकोर्ट के बिस्वजीत मंडल मामले में अपनाए गए दृष्टिकोण को स्वीकार किया गया, जिसमें वास्तविक हिरासत के समय से ही संवैधानिक समय-सीमा शुरू होने की बात कही गई थी।
एनडीपीएस एक्ट जैसे सख्त कानूनों के तहत दर्ज मामलों में भी यह फैसला महत्वपूर्ण है। इस कानून की धारा 37 में कुछ मामलों में जमानत के लिए कठोर शर्तें निर्धारित हैं, लेकिन इनका अर्थ यह नहीं है कि जांच एजेंसियों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की छूट मिल जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गिरफ्तारी से संबंधित अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त हैं। गंभीर आरोप होने के बावजूद किसी व्यक्ति को संवैधानिक संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।
दरअसल, पुलिस और जांच एजेंसियों को अपराधों की जांच करने तथा दोषियों को कानून के दायरे में लाने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार संविधान की सीमाओं के अधीन है। जांच की आवश्यकता के नाम पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित करना कानून के शासन की भावना के खिलाफ है। इसीलिए पुलिस के लिए जांच के साथ-साथ निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना भी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिरासत प्रक्रिया में पारदर्शिता और पुलिस की जवाबदेही मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इससे जांच एजेंसियों को स्पष्ट संदेश मिला है कि औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके वास्तविक हिरासत की अवधि छिपाई नहीं जा सकती। साथ ही मजिस्ट्रेटों की भूमिका भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इस फैसले का मूल संदेश स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता जिस क्षण प्रतिबंधित होती है, उसी क्षण से उसके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा भी अनिवार्य हो जाती है। कानून से ऊपर कोई जांच एजेंसी नहीं है और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।