भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः असम एक बार फिर प्रकृति के प्रकोप से जूझ रहा है। राज्य के छह जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है और सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक साढ़े चार लाख से अधिक, यानी 4.45 लाख से अधिक लोग इस आपदा की चपेट में आ चुके हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक शिवसागर, गोलाघाट, चराइदेव, जोरहाट, नगांव और कामरूप (महानगर) जिलों में हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि पिछले चौबीस घंटों में किसी नई मौत की पुष्टि नहीं हुई है, और इस वर्ष की बाढ़ में अब तक मरने वालों की संख्या 68 पर ही स्थिर बनी हुई है।
सबसे अधिक प्रभावित जिला चराइदेव है, जहां लगभग 1.88 लाख लोग बाढ़ की मार झेल रहे हैं। इसके बाद शिवसागर का नंबर आता है, जहां करीब 1.44 लाख निवासी प्रभावित हुए हैं, जबकि जोरहाट में यह आंकड़ा 74 हज़ार से अधिक है। प्रशासन की मानें तो 21 राजस्व मंडलों के अंतर्गत आने वाले 631 गांव अब भी जलमग्न हैं। धनसिरी नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जिसने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। खेतों में लगी फसलें बड़े पैमाने पर बर्बाद हो चुकी हैं और सैकड़ों घरों को नुकसान पहुंचा है। रिपोर्टों के अनुसार 171 घर पूरी तरह ध्वस्त हो गए हैं जबकि साढ़े चार हज़ार से अधिक घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। सड़कें टूट गई हैं, शिक्षण संस्थान जलमग्न हो गए हैं और कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा पानी में डूब चुका है। राज्य सरकार ने इस आपदा से निपटने के लिए युद्धस्तर पर राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया है। अब तक 184 राहत शिविर स्थापित किए जा चुके हैं, जिनमें लगभग 28,695 विस्थापित लोगों को शरण दी गई है। बचाव अभियान में 67 नावों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि जलमग्न इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके। शिवसागर और गोलाघाट जैसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में चावल, दाल और नमक जैसी आवश्यक राहत सामग्री का वितरण किया जा रहा है। कामरूप महानगर के दिसपुर राजस्व मंडल में शहरी बाढ़ की स्थिति भी दर्ज की गई है, विशेष रूप से चांदमारी क्षेत्र में, हालांकि वहां से अभी तक बड़े पैमाने पर विस्थापन की खबर नहीं है।
इस पूरे संकट के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि आखिर हर साल असम को इस तरह की विनाशकारी बाढ़ का सामना क्यों करना पड़ता है। यह कोई नई समस्या नहीं है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां लगभग हर मानसून में अपने किनारों को तोड़ देती हैं और लाखों लोगों का जीवन अस्तव्यस्त कर देती हैं। यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पीड़ितों की तकलीफ हर साल दोहराई जाती है, मगर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम अब भी अधूरे नज़र आते हैं।
तटबंधों का रखरखाव, नदियों की सिल्ट सफाई और जल निकासी की उचित व्यवस्था जैसे बुनियादी उपाय समय रहते नहीं किए जाते, जिसका खामियाजा हर बार आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। स्थानीय राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सरकार से त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की मांग की है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राज्य अध्यक्ष अहमद अली अय्यूबी ने स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा दोनों ही इस पूरी स्थिति पर करीबी नज़र बनाए हुए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अतिरिक्त एक पांच सदस्यीय केंद्रीय दल ने भी प्रभावित इलाकों का दौरा किया है, जिससे केंद्र सरकार की गंभीरता का संकेत मिलता है। बहरहाल, केवल राहत सामग्री बांटने या अस्थायी शिविर बनाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। बाढ़ पीड़ितों की सबसे बड़ी मांग यही है कि उन्हें न केवल तत्काल राहत मिले, बल्कि क्षतिग्रस्त घरों, खेतों और आजीविका के साधनों के पुनर्निर्माण के लिए उचित मुआवज़ा भी दिया जाए।
कई परिवार ऐसे हैं जिनकी पूरी फसल बर्बाद हो चुकी है और जिनके सामने आगामी महीनों में भोजन का संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में सरकार को केवल अल्पकालिक राहत तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक पुनर्वास योजना पर भी ध्यान देना होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का व्यवहार अनिश्चित होता जा रहा है, जिससे बाढ़ की तीव्रता और आवृत्ति दोनों में इजाफा देखा जा रहा है। ऐसे में केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन नीति, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और मजबूत आधारभूत ढांचे में निवेश समय की मांग है।
असम सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी इस दिशा में मिलकर काम करना होगा, ताकि हर वर्ष लाखों लोगों को इस पीड़ा से गुज़रना न पड़े। फिलहाल राहत की बात यह है कि जलस्तर धीरे-धीरे घट रहा है और स्थिति में सुधार के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब पानी उतरने के बाद पुनर्निर्माण और पुनर्वास का वास्तविक कार्य शुरू होगा। तभी यह तय हो पाएगा कि सरकार ने पीड़ितों की पुकार को सही मायनों में सुना है या नहीं।