मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में कथित रूप से ‘जहरीले’ पानी की आपूर्ति को लेकर हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। शहर के कई इलाकों से दूषित पानी की शिकायतें सामने आने के बाद लोगों में दहशत का माहौल है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि नलों से आ रहे पानी में बदबू, असामान्य रंग और रासायनिक तत्वों जैसे लक्षण दिख रहे हैं, जिससे उल्टी-दस्त और त्वचा संबंधी समस्याओं के मामले बढ़े हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन पर तत्काल कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
इस बीच, मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के एक बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया। आरोप है कि पानी संकट पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने आपत्तिजनक और अपशब्दों का प्रयोग किया, जिसे लेकर विपक्ष ने कड़ा ऐतराज जताया है। कांग्रेस ने इसे जनता की पीड़ा का अपमान बताते हुए मंत्री के बयान को असंवेदनशील करार दिया है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इंदौर जैसे बड़े शहर में पीने के पानी की गुणवत्ता से समझौता सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार समस्या को गंभीरता से लेने के बजाय गैर-जिम्मेदार बयानबाजी कर रही है। कांग्रेस ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्काल इस्तीफा देने की मांग की है और साथ ही पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की भी मांग उठाई है।
वहीं, नगर निगम और जल आपूर्ति विभाग ने दूषित पानी की शिकायतों के बाद कुछ इलाकों में पानी की सप्लाई अस्थायी रूप से रोक दी है। अधिकारियों के अनुसार, पानी के नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए हैं और रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि जांच पूरी होने तक उबले हुए या वैकल्पिक स्रोतों से पानी का उपयोग करें।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच आम नागरिकों की चिंता बढ़ती जा रही है। कई सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासन से साफ पानी की तत्काल आपूर्ति सुनिश्चित करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते स्थिति पर काबू नहीं पाया गया, तो यह संकट बड़े स्वास्थ्य आपदा का रूप ले सकता है।
कुल मिलाकर, इंदौर में पानी को लेकर उपजा यह संकट अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।