भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस नए कानून के तहत परीक्षा में पेपर लीक और अन्य अनुचित साधनों में लिप्त पाए जाने वालों को अब अधिकतम दस वर्ष की कैद और पचास लाख रुपये तक का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इससे पहले 2024 में लागू हुए मूल कानून में अधिकतम सजा पांच वर्ष तक सीमित थी, जिसे अब दोगुना कर दिया गया है। केंद्रीय राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने यह विधेयक 27 जुलाई को सदन में पेश किया था, और महज दो दिन के भीतर इसे मंजूरी मिल गई। संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष के भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच यह विधेयक पारित हुआ, और स्वीकृति मिलते ही सदन की कार्यवाही उसी दिन के लिए स्थगित कर दी गई।
यह कोई साधारण विधायी कदम नहीं है, बल्कि पिछले कुछ हफ्तों में देशभर में उमड़े छात्र आक्रोश की सीधी प्रतिक्रिया है। कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए बड़े पैमाने के छात्र प्रदर्शनों ने सरकार को इतना बैकफुट पर धकेल दिया कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह घटनाक्रम बताता है कि परीक्षा प्रणाली की साख को लेकर युवाओं का धैर्य अब जवाब दे चुका है, और सरकार के लिए इस मुद्दे को टालना अब राजनीतिक रूप से असंभव हो गया था।
सदन में बोलते हुए जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि नीट पेपर लीक मामले में सरकार ने त्वरित कार्रवाई की, और 2024 में कानून लागू होने के बाद से अब तक 52 प्राथमिकियां दर्ज की जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संशोधन विधेयक इस बात का संकेत है कि सरकार अनुभव से सीखने को तैयार है, और पेपर लीक से जुड़ी आत्महत्याओं की दर में भी पिछले कुछ वर्षों में कमी आई है। हालांकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर उन्होंने संसदीय मर्यादाओं और सरकार के कामकाज की समझ न होने का आरोप भी जड़ा, जो दर्शाता है कि गंभीर नीतिगत बहस भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अछूती नहीं रह पाई।
नए कानून की सबसे उल्लेखनीय बात केवल सजा की अवधि बढ़ाना भर नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया को तेज करना भी है। विधेयक में पेपर लीक से जुड़े मामलों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करने की समय-सीमा तय की गई है, ताकि आरोपियों को त्वरित सजा मिल सके और पीड़ित छात्रों को बार-बार परीक्षा स्थगन या पुनर्परीक्षा जैसी अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। फास्ट-ट्रैक सुनवाई की व्यवस्था भी इस उद्देश्य से जोड़ी गई है कि न्याय प्रक्रिया लंबी खिंचकर अपना असर न खोए।
यह ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार अकेली इस दिशा में सक्रिय नहीं रही है। बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों ने पहले ही अपने-अपने स्तर पर सख्त कानून बनाए हैं, जिनमें दस वर्ष तक की कैद और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। इससे यह स्पष्ट होता है कि परीक्षा प्रणाली में भरोसे का संकट कोई क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी चुनौती बन चुकी है, जिससे लगभग हर राज्य सरकार किसी न किसी रूप में जूझ रही है।
फिर भी, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केवल सजा कड़ी करने से पेपर लीक जैसी समस्या की जड़ खत्म हो जाएगी। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव बताते हैं कि परीक्षा माफिया और सॉल्वर गिरोह अत्यंत संगठित रूप से काम करते हैं, जिनमें अक्सर परीक्षा एजेंसियों, छपाई ठेकेदारों और यहां तक कि प्रशासनिक तंत्र के कुछ हिस्सों की मिलीभगत भी सामने आती रही है। यदि परीक्षा-पत्र तैयार करने, छापने, परिवहन करने और वितरित करने की पूरी शृंखला में तकनीकी और प्रशासनिक खामियां बनी रहती हैं, तो केवल दंड की अवधि बढ़ा देने से निवारण का प्रभाव सीमित ही रहेगा। असली जरूरत इस बात की है कि परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो, डिजिटल सुरक्षा प्रणाली मजबूत बनाई जाए, और प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित की जाए।
छात्रों के भरोसे को दोबारा हासिल करने के लिए सरकार को केवल कानूनी सख्ती दिखाने भर से आगे बढ़कर संस्थागत सुधार पर भी ध्यान देना होगा। जिन लाखों युवाओं ने वर्षों मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, उनके लिए एक लीक हुआ पेपर केवल एक परीक्षा रद्द होने भर की बात नहीं है, बल्कि उनके समय, संसाधन और मानसिक स्थिति पर गहरी चोट है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार पेपर लीक के बाद पुनर्परीक्षा में होने वाली देरी को भी न्यूनतम करे, और प्रभावित छात्रों के लिए स्पष्ट व पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए।
कुल मिलाकर, यह संशोधन विधेयक सही दिशा में उठाया गया एक कदम है, जो दर्शाता है कि सरकार जनदबाव और छात्र आंदोलन के प्रति संवेदनशील है। लेकिन कानून की सख्ती तभी सार्थक साबित होगी जब उसके साथ-साथ परीक्षा प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरियों को भी दूर किया जाए। दंड बढ़ाना निवारक भूमिका निभा सकता है, परंतु स्थायी समाधान तभी संभव है जब भ्रष्टाचार और लापरवाही की गुंजाइश को जड़ से समाप्त किया जाए।