भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर गिरावट की राह पर है। लगातार तीसरे सप्ताह रिजर्व में कमी दर्ज की गई है, जिससे आर्थिक विशेषज्ञों और बाजारों में चिंता बढ़ गई है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश का फॉरेक्स रिजर्व घटकर 688.104 अरब डॉलर पर आ गया है। यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज की गई है, जब वैश्विक वित्तीय बाजार अस्थिर हैं और डॉलर के मुकाबले अधिकांश मुद्राएं दबाव में दिखाई दे रही हैं।
रिजर्व में इस कमी के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक जिम्मेदार हैं। सबसे पहले, रुपये पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया है। डॉलर की मांग बढ़ने के कारण, केंद्रीय बैंक को मुद्रा स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने भंडार का उपयोग करना पड़ रहा है। इसके अलावा, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स में उतार-चढ़ाव और वैश्विक निवेशकों की सतर्कता ने भी भारतीय बाजारों से पूंजी बहिर्गमन को तेज किया है। इससे फॉरेक्स रिजर्व पर नकारात्मक असर पड़ा है।
विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी चिंताजनक है, लेकिन यह तत्काल संकट की स्थिति नहीं है, क्योंकि भारत अभी भी दुनिया के सबसे अधिक भंडार वाले देशों में शामिल है। फिर भी, लगातार गिरावट संकेत देती है कि वैश्विक आर्थिक दबावों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर की मजबूती जैसे कारक आने वाले हफ्तों में भी प्रभाव डाल सकते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (FCA) में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जो कुल भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होती है। गोल्ड रिजर्व में मामूली कमी और स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) सहित अन्य घटकों में भी हल्की गिरावट देखी गई है। ये सभी आंकड़े बताते हैं कि भारत का फॉरेक्स बफर फिलहाल दबाव में है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया भर में सेंट्रल बैंकों की मौद्रिक नीतियों में बदलाव, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर संभावित फैसलों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण विदेशी निवेशकों का रुझान अभी स्थिर नहीं है। ऐसे माहौल में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
सरकार का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है और विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर अभी भी आयात जरूरतों को लंबे समय तक पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर गिरावट का सिलसिला जारी रहा तो आयात लागत बढ़ सकती है, रुपये में और कमजोरी आ सकती है और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल बाजार की नजर RBI की आगामी नीतियों और वैश्विक आर्थिक संकेतकों पर टिकी हुई है, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी भविष्य के आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकती है।